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देश में आरक्षण के जनक थे छत्रपति शाहूजी महाराज

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रिपोर्ट – परवेज आलम 

जाति समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है

प्रायागराज। छत्रपति शाहूजी महाराज का जन्म 26 जून 1874 ई. को कुन्बी (कुर्मी) जागीरदार श्रीमंत जयसिंह राव आबा साहब घाटगे के यहां हुआ था। बचपन में इन्हें यशवंतराव के नाम से जानते थे। छत्रपति शिवाजी महाराज (प्रथम) के दूसरे पुत्र के वंशज शिवाजी चतुर्थ कोल्हापुर में राज्य करते थे। ब्रिटिश षडयंत्र और अपने ब्राह्मण दीवान की गद्दारी की वजह से जब शिवाजी चतुर्थ का कत्ल हुआ तो उनकी विधवा आनंदीबाई ने अपने जागीरदार जयसिंह राव आबासाहेब घाटगे के पुत्र यशवंतराव को मार्च, 1884 ई. में गोद ले लिया।
बचपन में ही यशवंतराव को कोल्हापुर रियासत की राजगद्दी सम्भालनी पड़ी। हालांकि राज्य का नियंत्रण उनके हाथ में 2 अप्रैल 1894 में आया। छत्रपति शाहूजी महाराज का विवाह बड़ौदा के मराठा सरदार खानवीकर की बेटी लक्ष्मीबाई से हुआ था। शाहूजी महाराज की शिक्षा राजकोट के राजकुमार महाविद्यालय और धारवाड़ में हुई थी। वे 1894 ई. में कोल्हापुर रियासत के राजा बने उक्त बातें डा. अम्बेडकर वेलफेयर एसोसिएशन (दावा) और प्रबुद्ध फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में छत्रपति शाहूजी महाराज की यमुनापार के तहसील बारा के विकास खण्ड जसरा के ग्रामसभा पांडर के मजरा कालिका का पूर्वा में मनाई गई 149 वीं जयन्ती पर दावा अध्यक्ष उच्च न्यायालय के अधिवक्ता आईपी रामबृज ने कही।
दावा अध्यक्ष ने आगे बताया कि उस समय जातिवाद के कारण समाज का एक वर्ग पिस रहा था तो छत्रपति शाहूजी महाराज ने दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। जिससे दलित और पिछड़ी जातियों में शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी परन्तु उच्च वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया। वे छत्रपति शाहूजी महाराज को अपना शत्रु समझने लगे। उनके पुरोहित तक ने यह कह दिया कि आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है। छत्रपति शाहूजी महाराज ने इस सारे विरोध का डटकर सामना किया और अपने राज्य में राज पुरोहित पद पर सिर्फ ब्राह्मण की नियुक्ति पर रोक लगा दी।

समाजसेवी देशराज बौद्ध ने बताया कि छत्रपति शाहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। इस पर उन्होंने कहा वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते।
समाजसेवी फूलचंद ने बताया कि शाहू महाराज ने 15 जनवरी 1919 के अपने आदेश में कहा था कि उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में यह सुनिश्चित किया जाय कि दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो। उनका स्पष्ट कहना था कि छुआछूत को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।
समाजसेवी राजेंद्र ने बताया कि 15 अप्रैल 1920 को नासिक में छात्रावास की नींव रखते हुए शाहूजी महाराज ने कहा कि जातिवाद का अंत ज़रूरी है। जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है। जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं। निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिये। शाहूजी महाराज ने ही दलित और पिछड़ी जातियों को मुख्य धारा में लाने के लिये अपने राज्य में पचास प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था लागू की।
समाजसेवी रामाशंकर ने बताया कि शाहूजी महाराज ने डा. अम्बेडकर द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका “मूकनायक” के लिये सहयोग प्रदान किया था। उनका कहना था कि उन्हें जिसकी तलाश थी डा. अम्बेडकर के रूप में उन्हें उनका सच्चा उत्तराधिकारी मिल गया है।
जयंती समरोह में कल्लो देवी, रुक्मणि, सुशीला, उर्मिला, सविता, सूरज कली, सावित्री, ऊमा, फूलकली, रमपती, विमला, शीला, विमला,रेखा आदि उपस्थित रहे।

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