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सन्त शिरोमणि गुरु रैदासजी की 648 वीं जयन्ती पर निकाली गई भव्य शोभा यात्रा

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रिपोर्ट –  परवेज आलम

सन्त रैदास श्रमण संस्कृति के वाहक थे
सन्त रैदास समतामूलक समाज के पक्षधर थे
सन्त रैदास भक्ति नहीं बल्कि क्रान्ति कर रहे थे

जसरा प्रयागराज। प्रबुद्ध फाउंडेशन, देवापती मेमोरियल ट्रस्ट, डा. अम्बेडकर वेलफेयर एसोसिएशन (दावा) और बाबासाहेब शादी डाट काम के संयुक्त तत्वावधान में संतों में ध्रुवतारा श्रमण संस्कृति के वाहक एवं सामाजिक,राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक क्रान्ति के अग्रदूत सन्त शिरोमणि गुरु रैदासजी की 648 वीं जयन्ती के पावन अवसर पर विकास खण्ड जसरा के गांव जसरा में जसरा गांव से गौहनिया बाजार तक और गौहनिया बाजार से जसरा बाजार तक भव्य व विशाल शोभा यात्रा निकाली गई तथा जसरा गांव में एकदिवसीय सन्त सम्मेलन और बहुजन भंडारे का आयोजन देशराज बौद्ध की अध्यक्षता में की गई।

भोलानाथ चौधरी बतौर मुख्य अतिथि अपने सम्बोधन में कहा कि सन्त रैदास ने श्रमिक जातियों का महत्व शोषक जातियों से अधिक बताया है क्योंकि श्रमिक जातियां देश के उत्पादन में अधिक भूमिका निभाता है। इसीलिये श्रमिक उपयोगी तबका है बनस्पति निठल्ले जी चुराने वाले शोषक तबकों के।

गुलाब चौधरी ने बतौर मुख्य वक्ता अपने सम्बोधन में कहा कि सन्त रैदास भक्त नहीं थे बल्कि सन्त थे। भक्त किसी के प्रति आस्थावान होता है किन्तु सन्त क्रांतिकारी होता है और वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के विवेक पर चलता है। संत रैदास समतामूलक समाजवादी व्यवस्था के पोषक थे।
समरजीत चौधरी और मनोज कुशवाहा ने कहा कि सन्त रैदास की वैचारिकी में कि ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिले सभी को अन्न, छोट बड़े सब सम बसे, रैदास रहे प्रसन्न. ऐसा राज्य साम्यवादी शासन में ही सम्भव है जिसमें उत्पादन के साधनों पर सबका बराबर हक हो।

रामबृज गौतम ने बताया कि सन्त रैदास करिश्माओं के कायल नहीं थे और जो करिश्माये सन्त रैदास के बारे में कही गयी है बे सब मनगढ़ंत है। सन्त रैदास कर्म की प्रधानता के स्थान पर कर्मकाण्ड, पाखण्ड, अंधविश्वास, भक्ति व आस्था के विरुद्ध थे।

जयन्ती समारोह मे गुलाब चौधरी, समरजीत चौधरी, मनोज कुशवाहा, हरिश्चंद्र कुरील, बनवारीलाल कुशवाहा, दिनेश कुमार चौधरी, गब्बर सिंह, अभय राज दीपांकर, हीरालाल चौधरी, कृष्ण कुमार, फूलचंद्र, राजू, संतोष, राजेन्द्र, मुकेश, दीदान बाबू,उर्मिला, अंगूरा, मीरा के साथ हजारों महिलाएं उपस्थित रही।

 

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