“मृत्यु का सच और मोक्ष का रहस्य – मेरी मणिकर्णिका यात्रा”
कुछ यात्राएँ हम तय करते हैं, और कुछ यात्राएँ हमें चुन लेती हैं।
मैं, राहुल — एक साधारण-सा लेखक, जो ज़िंदगी के शब्दों को महसूस कर के पन्नों पर उतारता रहा है। न कोई खास योजना थी, न ही कोई उद्देश्य, बस मन भटका हुआ था, जैसे आत्मा किसी उत्तर की तलाश में हो।
एक दिन यूँ ही बिना कुछ सोचे, मैं अपने दोस्तों आशु , चन्दन , विशाल के साथ बनारस की ओर निकल पड़ा। कहा नहीं जा सकता कि उस सफ़र की मंज़िल क्या थी, लेकिन दिल के किसी कोने में एक खिंचाव था — कुछ ऐसा जिसे शब्द नहीं दे सकता था, बस महसूस किया जा सकता था।
बनारस – जहां समय ठहर जाता है
जब ट्रेन बनारस स्टेशन पर रुकी, तब तक सूरज आधा गंगा में उतर चुका था। स्टेशन से बाहर निकलते ही एक अलग ही दुनिया ने मेरा स्वागत किया — भीड़, शोर, मंदिरों की घंटियाँ, और हवा में एक अलग-सी ऊर्जा थी ।
फिर मैं दोस्तों के साथ ऑटो से दशाश्वमेध घाट पंहुचा तो हवाओं में बसी अगरबत्ती की खुशबू ने मुझे जकड़ लिया। राहुल बिना कुछ कहे गंगा की ओर बढ़ गया। स्नान की वो पहली छींटें जब मेरे चेहरे से टकराईं, मानो सारे शब्द बह गए ।
माँ गंगा में स्नान के बाद मैं भगवान काशी विश्वनाथ जी के दर्शन के लिए गया । वहां की घंटियों की गूंज ने राहुल के भीतर की नींद को तोड़ा। वहां सिर्फ भगवन शिव नहीं थे, वहां इतिहास की अनगिनत परतें थीं, श्रद्धा की गहराई थी, और लेखक की आत्मा को स्पर्श करती नीरवता थी।
वो एकटक देखता रहा शिवलिंग को… शायद उसी क्षण उसने तय किया कि काशी पर कुछ लिखे बिना लौटना एक पाप होगा।
फिर मैं काशी की गलियाँ की ओर बड़ा जैसे कोई पुरानी कविता, जिसमें हर मोड़ पर एक छुपा हुआ शेर मिल जाए। वहां गायें भी चलती हैं जैसे उन्हें कोई जल्दी न हो, चाय की दुकानों से उठती भाप में भी दर्शन होता है, और पान की दुकानें जैसे किस्सों की दुकान हों।
राहुल और उसके दोस्त – चंदन, आशु और विशाल – गलियों में ऐसे डूबे जैसे कोई कहानी किसी पुराने किस्से में। हर गली में कोई नया रंग था, कोई नया अनुभव।
चलते-चलते घाटों की ओर बढ़ता चला गया। एक-एक घाट जैसे मुझे बुला रहे हों।
फिर… मेरी आंखें ठहर गईं उस घाट पर, जहां चिताओं की आग ठंडी नहीं पड़ती — मणिकर्णिका घाट।
पहली झलक – जीवन का वास्तविक दर्शन
जब मैंने पहली बार मणिकर्णिका घाट को देखा, तो कुछ पल के लिए शब्द गुम हो गए।
चिताएं जल रही थीं, लकड़ियाँ चटक रही थीं, हवा में राख तैर रही थी, और गंगा सब कुछ देखती हुई चुपचाप बह रही थी। लोगों के चेहरों पर कोई दुख नहीं था, सिर्फ एक स्वीकार था — कि यही अंतिम सत्य है।
मैंने देखा एक बेटा अपनी मां को अंतिम बार देख रहा है… एक औरत माथे पर गंगाजल डाल रही है… और वहीं एक डोम चुपचाप चिता की लकड़ियाँ सुलगा रहा है।
मैं वहीं घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया। लगा जैसे समय थम गया हो, जैसे इस घाट ने हजारों सालों से हर आहट, हर क्रंदन, हर मंत्र को सुना हो… और फिर भी शांत रहा हो।
रहस्य, पौराणिकता और चेतना
मुझे स्थानीय एक वृद्ध पंडा मिले। उन्होंने कहा — “बाबा, ये घाट कोई आम जगह नहीं। यहाँ स्वयं भगवान शिव महाकाल के रूप में विराजमान हैं।। जो यहां मरे, उसे फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ता।”
मैंने उनसे मणिकर्णिका नाम का अर्थ पूछा। वे बोले — “भगवान विष्णु ने जब तप किया, तो उनके कान की बाली यानी ‘कर्णिका’ और ‘मणि’ यहां गिरी थी। तभी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा।”
उनकी आंखों में जो विश्वास था, वह किसी किताब से नहीं आता — वह अनुभव से आता है। उस दिन मैंने जाना कि मणिकर्णिका घाट कोई धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई को जीने का स्थान है।
डोम – जिन्हें मृत्यु का रक्षक कहा जाता है
मुझे घाट पर एक डोम से मिलने का अवसर मिला। – वे बोले, “हम तो बस अग्नि देते हैं, लेकिन असल में हम मोक्ष की सीढ़ी पकड़ाते हैं।” उनका यह कहना मुझे भीतर तक छू गया।
जहां समाज उन्हें निचले स्तर पर रखता है, वहीं धार्मिक दृष्टिकोण से वे मोक्ष का द्वार खोलने वाले हैं। यह विरोधाभास मेरे लेखक मन को हिला गया। मैं उस रात घाट पर ही एक कोने में बैठा रहा… लिखता रहा, सोचता रहा… महसूस करता रहा।
रात की चिता और मौन संवाद
रात का समय… चिता की लपटें… और गंगा का शांत प्रवाह…
कभी-कभी कुछ दृश्य इतने गहरे होते हैं कि शब्द भी उन्हें नहीं छू सकते। उस रात मणिकर्णिका घाट पर मैंने न केवल मृत्यु देखी, बल्कि मृत्यु से बात की।
मुझे लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति कह रही हो — “राहुल, लिख… क्योंकि जो तू देख रहा है, वह दुनिया को शब्दों में समझना ज़रूरी है।”
मैंने वहीं एक डायरी निकाली, और पहला वाक्य लिखा —”मृत्यु डरावनी नहीं है, वह केवल जीवन के भ्रम का पर्दा हटा रही है।”
वह लोग जो काशी में मरना चाहते हैं
अगले दिन मैं काशी मुक्त भवन गया — जहां लोग अंतिम सांस लेने की प्रतीक्षा में रहते हैं।
एक वृद्ध बाबा से मिला, जो पिछले चार महीने से वहीं रह रहे थे। मैंने पूछा — “बाबा, डर नहीं लगता मृत्यु से?”
वे मुस्कराए — “डर किस बात का बेटा? जन्म लिया तो मरना ही है। लेकिन यदि यहीं मरा, तो फिर जन्म नहीं लेना पड़ेगा।”
उनकी आंखों में जो शांति थी, वह किसी स्वर्ग से भी ऊंची थी।
और तब मैंने यह लेख लिखना शुरू किया…
काशी की उस यात्रा ने मेरी आत्मा को छू लिया था। मैंने जो देखा, जो महसूस किया, जो सीखा — वह सब शब्दों में बदलने को मजबूर हो गया।
यह लेख एक रिपोर्ट नहीं, एक अनुभव है। मणिकर्णिका घाट ने मुझसे कुछ नहीं कहा, पर सब कुछ समझा दिया।
यह घाट केवल चिता नहीं जलाता, यह भीतर के अहंकार, भ्रम और भय को भी राख करता है।
लेखक का आत्मस्वरूप – राहुल की दृष्टि
मैं, राहुल — इस लेख का लेखक नहीं, बस एक माध्यम हूँ। यह लेख मैंने नहीं लिखा, इस लेख ने मुझे लिखा।
काशी की गलियों, मणिकर्णिका की आग, गंगा की लहरों और डोम की आंखों ने मुझे शब्द दिए, भाव दिए, आत्मा दी।
अब जब कोई मुझसे पूछता है — “राहुल, तुमने ये लेख कैसे लिखा?”
तो मैं कहता हूँ — “मैंने नहीं लिखा, मणिकर्णिका ने लिखा… मैं तो सिर्फ बैठा था घाट की एक सीढ़ी पर, कलम अपने आप चलती रही…।”
उपसंहार – जहां हर अंत एक नई शुरुआत है
मणिकर्णिका घाट मेरे लिए केवल एक स्थान नहीं रहा, यह मेरे लेखन, मेरी सोच और मेरी आत्मा का पुनर्जन्म बन गया।
यह घाट सिखाता है कि – मृत्यु डर नहीं है, वह मोक्ष है।
चिता सिर्फ शरीर की नहीं, वासनाओं की भी होती है।
गंगा केवल नदी नहीं, वह जीवन की सबसे बड़ी शिक्षिका है।
अब जब भी मैं जीवन से थक जाता हूँ, एकांत चाहता हूँ, या खुद को खोया हुआ पाता हूँ — तो मन में बस एक ही नाम आता है — मणिकर्णिका…

लेखक – राहुल मौर्या
राहुल एक युवा लेखक हैं, जिनकी लेखनी भावनाओं, अनुभवों और सत्य की गहराइयों से जुड़ी होती है। वे समाज, जीवन और मृत्यु को केवल विषय नहीं, अंतरात्मा के संवाद की तरह महसूस करते हैं। यह लेख उनकी बनारस यात्रा का आत्मिक परिणाम है, जिसे उन्होंने न केवल देखा, बल्कि जिया।
