दोस्ती की मिठास और एहसास
दोस्ती कोई रिश्ता नहीं होती जिसे दुनिया के बनाए नियमों में बाँधा जा सके। यह वह रिश्ता है जो तब जन्म लेता है जब ज़िंदगी थककर किसी अपने की तलाश में होती है। दोस्ती ज़िंदगी की उस चुप्पी में पैदा होती है जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं और एहसास बोलने लगते हैं।
मेरी दोस्ती भी कुछ ऐसी ही शुरू हुई थी—बिल्कुल साधारण। न कोई वादा, न कोई शर्त, न कोई उम्मीद। बस दो लोग थे, जिनके रास्ते एक मोड़ पर टकराए और फिर न जाने कब साथ चलने लगे। उस वक़्त हमें यह बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि हम एक-दूसरे की ज़िंदगी के सबसे ज़रूरी हिस्से बनने जा रहे हैं। हम तो बस उस पल को जी रहे थे, यह जाने बिना कि आने वाला वक़्त हमें कितना बदल देगा, कितना तोड़ेगा और कितना मजबूत बनाएगा।
शुरुआत में दोस्ती हँसी से भरी होती है—बहुत सारी हँसी। छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाना, बेवजह देर रात तक जागना, बिना किसी डर के सपनों की बातें करना। तब ज़िंदगी बहुत आसान लगती है। दुख शब्दों तक सीमित रहते हैं, दिल तक नहीं पहुँचते। खुशियाँ छोटी होती हैं, लेकिन सच्ची होती हैं। चाय की एक प्याली, एक अधूरा मज़ाक, एक पुरानी कहानी—सब कुछ काफ़ी होता है।
तब दोस्ती हल्की लगती है, जैसे हवा का झोंका। लेकिन धीरे-धीरे समझ आता है कि यह हवा नहीं थी—यह तो वह ज़मीन थी, जिस पर हम खड़े होकर ज़िंदगी के तूफ़ानों का सामना करने वाले थे।
वक़्त के साथ ज़िंदगी ने अपने असली रंग दिखाने शुरू किए। ज़िम्मेदारियाँ आईं। सपनों पर बोझ पड़ा। उम्मीदें बढ़ीं, और उनके साथ डर भी। मुस्कान चेहरे पर बनी रही, लेकिन दिल के भीतर थकान ने घर कर लिया। वहीं से दोस्ती का असली इम्तिहान शुरू हुआ।
दोस्ती की पहचान तब होती है, जब ज़िंदगी भारी लगने लगती है। जब सब कुछ होते हुए भी भीतर कुछ टूटता हुआ महसूस होता है। जब आप हँस रहे होते हैं, लेकिन अंदर से चुपचाप रो रहे होते हैं। ऐसे समय में दोस्त वही नहीं होता जो पूछे—
“क्या हुआ?”
असल दोस्त वह होता है जो बिना पूछे समझ जाए।
वह बस पास बैठ जाता है।
ख़ामोश।
और उसकी वही ख़ामोशी दिल का सबसे बड़ा सहारा बन जाती है।
लफ़्ज़ कम पड़ जाएँ जहाँ,
वहाँ दोस्ती बोलने लगती है,
भीड़ में जो हाथ थाम ले चुपचाप,
वही दोस्ती असली लगती है।
कभी-कभी शब्द हालात को और मुश्किल बना देते हैं। उस वक़्त दोस्त का चुप रहना, उसका सिर्फ़ साथ होना, किसी लंबी बात से ज़्यादा सुकून देता है। मैंने अपनी दोस्ती में यह सीखा कि हर दर्द का इलाज सलाह नहीं होता। कभी-कभी सिर्फ़ किसी का साथ ही काफ़ी होता है।
मैंने यह भी सीखा कि दोस्त वह नहीं होता जो हर दिन साथ दिखे, बल्कि वह होता है जो हर हाल में साथ महसूस हो। कई बार हफ्तों बात नहीं हुई। कई बार महीनों मुलाक़ात नहीं हुई। ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चलती रही। लेकिन जब ज़रूरत पड़ी, जब सब कुछ अचानक बिखरता हुआ लगा—तो उसी दोस्त की आवाज़ सबसे पहले कानों में गूँजी।
यही दोस्ती की मिठास है—
दूरी में भी पास होना।
बिना रोज़ बात किए भी जुड़े रहना।
बिना वादों के भी निभा जाना।
दोस्ती हमें कमजोर होने की इजाज़त देती है। यह इसकी सबसे बड़ी खूबी है। दुनिया के सामने हम रोज़ मज़बूत बनने का नाटक करते हैं। हर दिन खुद को साबित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन दोस्त के सामने यह नाटक टूट जाता है। वहाँ गिर जाना आसान लगता है। वहाँ रोना शर्म की बात नहीं लगती। क्योंकि वहाँ जजमेंट नहीं होता, तुलना नहीं होती—वहाँ सिर्फ़ अपनापन होता है।
मेरे दोस्त ने मुझे तब भी संभाला, जब मैं खुद को संभाल नहीं पा रहा था। जब मैं चुप था, उलझा हुआ था, खुद से नाराज़ था। उसने न कोई उपदेश दिया, न कोई बड़ा ज्ञान झाड़ा। उसने बस इतना कहा—
“मैं हूँ।”
और सच कहूँ, ज़िंदगी में इससे बड़ा सहारा कुछ नहीं होता। जब पूरी दुनिया सवाल पूछ रही हो, तब किसी का यह कहना कि “मैं हूँ”—दिल को ज़िंदा रखने के लिए काफ़ी होता है।
लेकिन दोस्ती सिर्फ़ सहारा ही नहीं होती, यह एक इम्तिहान भी होती है। इसमें हँसी के साथ-साथ दर्द भी आता है। इसमें नाराज़गी भी होती है। कई बार ego बीच में खड़ी हो जाती है। छोटी-छोटी बातों पर मन भारी हो जाता है। कभी-कभी लगता है कि अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं। अब शायद यह रिश्ता भी समय के साथ टूट जाएगा।
ऐसे वक़्त में सच्ची दोस्ती खुद को साबित करती है।
सच्ची दोस्ती वही होती है, जो टूटने के बाद भी बिखरती नहीं। जहाँ “मैं सही हूँ” से ज़्यादा अहम होता है—
“हम साथ रहें।”
यहाँ माफ़ी कमजोरी नहीं होती।
यहाँ झुकना हार नहीं होता।
यहाँ समझौता बेइज़्ज़ती नहीं, समझदारी होता है।
दोस्ती में माफ़ी शब्दों से नहीं, एहसास से दी जाती है। एक नज़र, एक छोटी-सी बात, एक सच्चा हालचाल—और सारी दूरी पिघलने लगती है।
वक़्त के साथ दोस्ती बदलती है। यह बदलना भी ज़रूरी है।
पहले घंटों बातें होती थीं, अब एक नज़र काफ़ी होती है।
पहले रोज़ मिलना ज़रूरी लगता था, अब बस यह जान लेना कि सामने वाला ठीक है।
पहले सपनों की बातें होती थीं, अब ज़िम्मेदारियों की।
लेकिन यह बदलाव दोस्ती को कमज़ोर नहीं करता। बल्कि और गहरा कर देता है। दोस्ती उम्र के साथ शांत हो जाती है, लेकिन खोखली नहीं होती। वह अंदर ही अंदर और मजबूत होती जाती है।
कुछ दोस्त खून के रिश्तों से भी ज़्यादा अपने हो जाते हैं। उनके दर्द में हमारी नींद उड़ जाती है। उनकी खुशी हमारी आँखों में चमक बनकर उतर आती है। ऐसे दोस्त ज़िंदगी का वह हिस्सा बन जाते हैं, जिनके बिना सब अधूरा लगता है।
खून के रिश्ते हमें जन्म से मिलते हैं, लेकिन दोस्ती हम खुद चुनते हैं। और जो रिश्ता चुनकर निभाया जाए, उसकी अहमियत हमेशा ज़्यादा होती है।
दोस्ती हमें आईना दिखाती है—लेकिन बेरहमी से नहीं। वह हमारी कमियाँ भी बताती है, लेकिन ताने बनाकर नहीं, प्यार बनाकर। वह हमें गिरने नहीं देती। और अगर हम गिर भी जाएँ, तो उठने का हौसला देती है। दोस्ती सुधारती है, तोड़ती नहीं।
कभी-कभी दोस्ती ज़िंदगी के सबसे अँधेरे दौर में सामने आती है। जब सब कुछ छूटता हुआ लगता है। जब भरोसे डगमगाने लगते हैं। जब अपना ही वजूद सवाल बन जाता है। ऐसे वक़्त में कोई दोस्त बिना बुलाए हमारे पास आ बैठता है। वह कुछ कहता नहीं, लेकिन उसकी मौजूदगी सब कुछ कह जाती है।
वही पल दोस्ती को अमर बना देता है।
दोस्ती और दूरी का रिश्ता भी अजीब होता है। कई बार दूरियाँ दोस्ती को कमज़ोर नहीं, बल्कि और मज़बूत कर देती हैं। मुलाक़ातें कम हो जाती हैं, लेकिन यादें और गहरी हो जाती हैं। एक छोटा-सा संदेश, एक पुरानी तस्वीर, एक अधूरी हँसी—और फिर वही अपनापन लौट आता है।
वक़्त ने बदला है रास्तों का पता,
मगर दिलों का रिश्ता वही रहा,
मुलाक़ातें कम हो गईं तो क्या,
दोस्ती का एहसास आज भी नया रहा।
दोस्ती वक़्त की मोहताज नहीं होती।
सालों बाद मिलने पर भी ऐसा लगता है, जैसे कल ही बात हुई हो। यही दोस्ती का जादू है। वक़्त इसे पुराना नहीं करता, बल्कि और कीमती बना देता है।
दोस्ती कभी बोझ नहीं बनती, अगर वह सच्ची हो। यह रिश्ता हमें बाँधता नहीं, बल्कि आज़ाद करता है। दोस्त हमें उड़ने से नहीं रोकता, बल्कि गिरने पर संभाल लेता है। वह हमारी जीत पर सबसे ज़्यादा खुश होता है और हमारी हार में सबसे ज़्यादा टूटता है।
दोस्ती की मिठास किसी मिठाई जैसी नहीं, जो समय के साथ फीकी पड़ जाए। यह तो वह स्वाद है, जो ज़िंदगी के हर मोड़ पर जीभ पर लौट आता है। कभी याद बनकर। कभी मुस्कान बनकर। और कभी आँखों की नमी बनकर।
आख़िर में दोस्ती यही सिखाती है कि ज़िंदगी अकेले लड़ने के लिए नहीं बनी। हर किसी को किसी अपने की ज़रूरत होती है—जो बिना शर्त, बिना सवाल, सिर्फ़ साथ निभाए। जो हमारे सबसे बुरे दौर में भी हमें बोझ न समझे।
अगर यह लेख पढ़ते हुए आपको किसी का चेहरा याद आ गया हो, किसी पुरानी हँसी की आवाज़ कानों में गूँज गई हो, या दिल भारी हो गया हो—तो समझ लीजिए, आपकी दोस्ती आज भी ज़िंदा है।
और जो दोस्ती दिल में ज़िंदा हो,
वह कभी मरती नहीं—
बस वक़्त के साथ और सच्ची होती जाती है।
लेखक – राहुल मौर्या
