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शिक्षा : जीवन की असली रोशनी

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शिक्षा : जीवन की असली रोशनी


शिक्षा मानव जीवन का वह दीपक है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। यह केवल अक्षरज्ञान या पढ़ना-लिखना सीखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती है। शिक्षा ही वह शक्ति है जो इंसान को पशु से अलग करती है, सोचने-समझने की क्षमता देती है और उसे समाज में सार्थक भूमिका निभाने योग्य बनाती है।

शिक्षा का महत्व
भारत में प्राचीन काल से शिक्षा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों से लेकर गुरुकुल प्रणाली तक, शिक्षा ने हमारी संस्कृति और सभ्यता को नई दिशा दी। शिक्षा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास, विवेक, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी पैदा करती है।

आज की प्रतिस्पर्धा भरी दुनिया में शिक्षा का महत्व और भी बढ़ गया है। बिना शिक्षा के न तो कोई अच्छा रोजगार पा सकता है और न ही आधुनिक तकनीक और विज्ञान के लाभ उठा सकता है। एक शिक्षित समाज ही विकास की ओर बढ़ सकता है।

व्यक्तिगत विकास में शिक्षा की भूमिका
शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारती है। यह उसे न केवल ज्ञान देती है, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाती है। शिक्षा से व्यक्ति में अनुशासन, आत्मविश्वास, तर्क करने की क्षमता और सही-गलत का भेद करने की समझ आती है। एक अशिक्षित व्यक्ति जहां अंधविश्वास और रूढ़ियों में फंसा रहता है, वहीं शिक्षित व्यक्ति नई सोच और सकारात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़ता है।

सामाजिक विकास में शिक्षा की भूमिका
शिक्षा का असर केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज पर भी पड़ता है। एक शिक्षित समाज में अपराध, भेदभाव और अंधविश्वास कम होते हैं। शिक्षा सामाजिक एकता, भाईचारे और समानता को बढ़ावा देती है। यही कारण है कि किसी भी देश की तरक्की उसके नागरिकों की शिक्षा पर निर्भर करती है।

महात्मा गांधी ने कहा था – “यदि हम वास्तविक स्वतंत्रता चाहते हैं तो हमें शिक्षा को समाज के हर वर्ग तक पहुँचाना होगा।”

आर्थिक विकास में शिक्षा की भूमिका
शिक्षा का सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था से है। एक शिक्षित नागरिक अधिक उत्पादक होता है और देश की प्रगति में योगदान देता है। आज के युग में ज्ञान आधारित उद्योग और तकनीक सबसे बड़ी पूंजी हैं। यही कारण है कि विकसित देश अपनी शिक्षा प्रणाली पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं।

भारत में शिक्षा की स्थिति
भारत में शिक्षा का स्तर लगातार बेहतर हो रहा है। साक्षरता दर पहले के मुकाबले बहुत बढ़ी है। सरकारी योजनाएँ जैसे सर्व शिक्षा अभियान, मिड-डे मील योजना, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आदि ने शिक्षा को जन-जन तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

फिर भी ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं है। वहां शिक्षकों की कमी, आधारभूत सुविधाओं की कमी और आर्थिक तंगी जैसी समस्याएँ मौजूद हैं। लड़कियों की शिक्षा पर भी कई जगह समाजिक और आर्थिक कारणों से रोक लगाई जाती है।

आधुनिक शिक्षा और चुनौतियाँ
आज शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रही है। तकनीक के बढ़ते प्रयोग ने शिक्षा को ऑनलाइन माध्यम से भी सुलभ बना दिया है। स्मार्ट क्लास, डिजिटल लर्निंग और ई-लाइब्रेरी ने ज्ञान को और आसान बना दिया है। लेकिन इसके साथ ही नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं जैसे –

  • शिक्षा का व्यवसायीकरण

  • बेरोजगारी की समस्या

  • केवल डिग्री पाने की होड़

  • नैतिक मूल्यों की कमी

यदि शिक्षा केवल रोजगार तक सीमित रह जाएगी और व्यक्ति के चरित्र निर्माण में विफल होगी, तो उसका असली उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।


शिक्षा जीवन का वह साधन है जो व्यक्ति को इंसानियत, संस्कार और सही दिशा देता है। यह केवल करियर बनाने का साधन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाने की नींव है। हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार मिलना चाहिए और यह जिम्मेदारी सरकार के साथ-साथ समाज और परिवार की भी है।

स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “शिक्षा का अर्थ है मनुष्य में निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति।”

इसलिए हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ना होगा जो केवल डिग्री देने तक सीमित न हो, बल्कि बच्चों में नैतिकता, देशप्रेम और जीवन कौशल भी विकसित करे। तभी शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा और भारत एक सशक्त, समृद्ध और विकसित राष्ट्र बन सकेगा।

लेखक – राहुल मौर्या

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