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“प्रेम और परछाई”

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“प्रेम और परछाई”

प्रेम और परछाई—दोनों की उपस्थिति का कोई निश्चित आकार नहीं होता, लेकिन जब ये साथ चलने लगते हैं, तो ज़िंदगी की तस्वीर कुछ और ही बन जाती है। परछाई के पास अपनी कोई रोशनी नहीं होती, वो दूसरे की रोशनी से ही जन्म लेती है। प्रेम भी कुछ-कुछ वैसा ही है—कभी आत्मा की रौशनी से जन्म लेता है, तो कभी किसी की उम्मीदों की छाया बनकर पीछे-पीछे चलता है। सवाल यह है कि जो हमारे साथ है, वो प्रेम है या सिर्फ़ उसकी परछाई?

परिभाषा का भ्रम

बचपन से हमने प्रेम की कहानियाँ सुनीं—हीर-रांझा, लैला-मजनूं, राधा-कृष्ण। हर कहानी में प्रेम के साथ संघर्ष जुड़ा रहा, लेकिन एक बात समान रही—उनके प्रेम की गहराई। पर क्या हर “मिलना” प्रेम है? क्या हर “साथ” होना सच्चे रिश्ते का संकेत है?
कई बार हम जिसे प्रेम समझते हैं, वह महज एक आदत होती है। जैसे दोपहर के सूरज में परछाई का साथ। जैसे ही शाम होती है, वह लंबी होती जाती है और रात में लुप्त। प्रेम अगर केवल उपस्थिति पर टिका है, तो वह परछाई से अलग नहीं। लेकिन अगर वह अनुपस्थिति में भी जीवित है, तो वह सच्चा प्रेम है।

आधुनिक प्रेम—डिजिटल परछाइयाँ

आज के समय में प्रेम इंस्टाग्राम की स्टोरी बन गया है—24 घंटे में मिट जाने वाला। व्हाट्सएप पर ‘टाइपिंग…’ से दिल धड़कते हैं, और ‘Seen’ से टूट जाते हैं। हम प्रेम नहीं करते, हम उसकी छवि से मोहब्बत करने लगे हैं।
उसने आखिरी बार कब फोन किया? कब “I miss you” कहा? कब देर रात आँखों में नींद नहीं थी? ये सारे सवाल प्रेम के नहीं, असुरक्षा के हैं। जो प्रेम परछाई की तरह चलने लगे—हर वक्त डर, असमंजस, दूरी—वो प्रेम नहीं रहा, वो एक आभासी परछाई है।

सच्चा प्रेम -अनकहा लेकिन जीवंत

सच्चा प्रेम वह है जो चुपचाप साथ देता है, बिना किसी शोर के। जैसे माँ की ममता, जो कुछ कहती नहीं, लेकिन हर दर्द को पहले समझ जाती है। जैसे वो लड़का जो अपने पुराने खतों को अब भी पढ़ता है, क्योंकि किसी ने कभी लिखा था—”मेरे बिना जीना मत।”
सच्चा प्रेम शोर नहीं करता, वह इंतज़ार करता है। वो दिन-रात गिनता है, वक़्त नहीं। उसे व्हाट्सएप पर ‘last seen’ नहीं चाहिए, उसे यकीन चाहिए। उसे रोज़ की बातचीत नहीं चाहिए, उसे एक एहसास चाहिए—कि कोई है, जो किसी को हर पल जी रहा है।

परछाई का धोखा

कभी-कभी हम एक इंसान से नहीं, उसकी परछाई से प्रेम करने लगते हैं। उसकी बातों से नहीं, उसकी आदतों से। उसकी मौजूदगी से नहीं, उसकी यादों से।
जैसे कोई रोज़ आपके साथ बैठता है, बातें करता है, लेकिन जब आप किसी तकलीफ़ में होते हैं, वो नहीं होता—वो प्रेम नहीं, परछाई है। परछाई हर वक्त साथ तो होती है, लेकिन कभी आपका हाथ नहीं पकड़ती। वो कभी आपको गले नहीं लगाती, वो सिर्फ दिखती है, होती नहीं।
प्रेम या परछाई—फैसला
तो सवाल वही है – क्या आपके जीवन में जो इंसान है, वो प्रेम है या परछाई?
अगर वो आपके साथ तब भी खड़ा है जब पूरी दुनिया आपके ख़िलाफ़ है – वो प्रेम है।
अगर वो आपके दर्द को बिना कहे समझ लेता है – वो प्रेम है।
अगर वो सिर्फ तब आता है जब उसे ज़रूरत हो – वो परछाई है।
अगर उसकी उपस्थिति में भी आप खुद को अकेला महसूस करते हैं – वो परछाई है।

प्रेम सवाल नहीं करता, वो उत्तर देता है। परछाई सिर्फ आकार बदलती है, प्रेम आकार नहीं देखता।

प्रेम का आत्मरूप

प्रेम केवल किसी और के प्रति नहीं होता। सच्चा प्रेम तब शुरू होता है जब हम खुद को स्वीकार करते हैं। जब हम अपनी परछाइयों से भागते नहीं, उन्हें गले लगाते हैं।
जो इंसान खुद से प्रेम करना सीख गया, उसके जीवन में परछाई सिर्फ दोपहर की साथी होती है—न कि भावनाओं की बंदी। और वही इंसान जब किसी और से प्रेम करता है, तो उसमें स्वार्थ नहीं, समर्पण होता है।

अंत की शुरुआत

कई बार ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ प्रेम और परछाई एक जैसे लगने लगते हैं। तब निर्णय मुश्किल होता है। लेकिन एक दिन जब हम थक जाते हैं, तब समझ आता है—परछाई के पीछे भागने से अच्छा है प्रेम की रौशनी की ओर बढ़ना।

क्योंकि परछाई हमेशा पीछे रहती है, लेकिन प्रेम आपके सामने खड़ा होता है—आँखों में आँखें डालकर ।
प्रेम और परछाई—दोनों ही ज़िंदगी में जरूरी हैं। परछाई हमें यह याद दिलाती है कि कोई रोशनी है, और प्रेम वह रोशनी है जिससे हम जीते हैं।
तो अगली बार जब आप किसी के साथ हों, खुद से एक सवाल ज़रूर करें—”क्या ये प्रेम है या सिर्फ उसकी परछाई?”
क्योंकि जब जवाब मिलेगा, तभी आप समझ पाएंगे कि आपके जीवन में क्या रहना चाहिए—सिर्फ एक आकार, या एक आत्मा।

 

लेखक – राहुल मौर्या 

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