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“क्या तुम सुन पा रहे हो? पेड़-पौधे तुम्हें पुकार रहे हैं”

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हर साल 5 जून को जब ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ आता है, तब अखबारों में कुछ पंक्तियाँ छपती हैं, सरकारी दफ्तरों में भाषण होते हैं, बच्चों को निबंध लिखवाए जाते हैं, और बड़े-बड़े मंचों से हरियाली बचाने की कसमें खाई जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी उस ज़ख़्मी धरती की कराह सुनी है, जो हमारी ही करतूतों की शिकार है? क्या आपने कभी पेड़ के कटते वक़्त उसकी चीख़ महसूस की है? या नदी के सूखते बहाव में उसकी सिसकी सुनी है?

हम इंसान, जिन्हें ‘बुद्धिमान प्राणी’ कहा गया है, आज उसी पर्यावरण का गला घोंट रहे हैं, जो हमारी साँसों की डोर थामे खड़ा है। इस लेख के माध्यम से हम उस दर्द, उस भावनात्मक टीस को शब्द देंगे जो एक पेड़, एक नदी, एक पहाड़ और एक पंछी वर्षों से झेल रहे हैं — लेकिन बेजुबान हैं।

1. माँ की तरह है यह प्रकृति — लेकिन हमने उसकी ममता को रौंद डाला

जब एक माँ अपने बच्चे के लिए हर दर्द सह लेती है, ठीक वैसे ही यह धरती, यह पेड़, यह जल, यह वायु, सब कुछ हमारे लिए सहते आ रहे हैं। लेकिन जब हमने अपनी भूख के आगे इनकी कराह अनसुनी की, तब प्रकृति ने भी धीरे-धीरे आँसू बहाने शुरू कर दिए।

हरियाली जो कभी हमारे आँगन में मुस्कुराती थी, आज मुरझाई पड़ी है। वो पक्षी जो सुबह चहचहाकर दिन की शुरुआत करते थे, अब कहीं दूर चले गए हैं। ये सब यूँ ही नहीं हुआ — हमने अपने स्वार्थ, अपने लालच और अपनी कथित ‘विकास’ की चाहत में अपनी ही माँ को मार डाला।

2. काटते गए पेड़, और सूखते गए रिश्ते

पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, वो हमारी भावनाओं के सच्चे साथी भी होते हैं। कभी गाँव के बड़ के नीचे बैठकर दादी कहानियाँ सुनाया करती थी, कभी आम के पेड़ पर चढ़कर बचपन की शरारतें होती थीं। लेकिन अब न वो दादी रही, न वो पेड़। हमने कंक्रीट के जंगल बना दिए, लेकिन इंसानियत के साये खो गए।

हर साल लाखों पेड़ काटे जाते हैं, पर कोई आँकड़ा यह नहीं बताता कि कितनी यादें मिटा दी गईं। जंगलों की जगह मॉल बन गए, नदियों की जगह सीवर की नालियाँ बहने लगीं, और जीवन की जगह शोरगुल ने घर कर लिया।

3. नदियों की पुकार: ‘मैं गंगा हूँ, पर अब मैं गंदगी की गंगा बन गई’

गंगा, यमुना, सरस्वती – ये नदियाँ सिर्फ जलधाराएँ नहीं थीं, ये हमारी संस्कृति की आत्मा थीं। लेकिन आज ये नदियाँ अपनी ही पहचान के लिए रो रही हैं। गंगा माँ कहकर जिस नदी की पूजा होती थी, उसमें अब फैक्टरियों का ज़हर घुल रहा है। यमुना दिल्ली में काली हो चुकी है, और सरस्वती तो जैसे अस्तित्व से मिटा दी गई है।

क्या आपने कभी नदी के किनारे बैठकर उसकी ख़ामोशी सुनी है? वो बहती नहीं रही अब, वो रुक-रुक कर सिसकती है। उसकी हर बूँद एक चीख़ है — हमारी लापरवाही की, हमारी बेरहमी की।

4. जानवरों की चीख़: जब जंगल काटे जाते हैं, तब बेजुबान रोते हैं

हमारे लिए जंगल बस लकड़ी का स्रोत हैं, लेकिन वहाँ लाखों प्राणियों का घर होता है। जब एक पेड़ कटता है, तो किसी परिंदे का बसेरा उजड़ता है। जब एक पहाड़ खोदा जाता है, तो किसी जंगली जानवर की राह खत्म हो जाती है।

हर साल सैकड़ों प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं — और ये सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, ये एक जीवन का अंत है। क्या आपने कभी किसी हिरण की माँ की आँखों में देखा है, जब उसका बच्चा शिकार हो जाता है? क्या किसी पिंजरे में बंद तोते की चुप्पी समझी है? अगर नहीं, तो शायद हमने इंसान होने का अर्थ ही खो दिया है।

5. प्लास्टिक: हमारी सुविधाओं की, धरती की सजा

हमने अपनी ज़िंदगी को सुविधाजनक बनाने के लिए प्लास्टिक का सहारा लिया। लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि यह प्लास्टिक कितनी सदियों तक इस धरती को ज़हर देता रहेगा?

धरती पर पड़ा हर प्लास्टिक का टुकड़ा एक ग़म की तरह है जो कभी खत्म नहीं होता। समुद्र की लहरों में उलझी कछुओं की लाशें, प्लास्टिक निगलते पक्षी, और नालियों में बहती पॉलीथिन — ये सब हमारी ही बनाई त्रासदी के प्रतीक हैं।

6. ग्लोबल वॉर्मिंग: जब धरती का बुखार बढ़ता है

धरती अब बीमार हो चुकी है। तापमान बढ़ता जा रहा है, बर्फ पिघल रही है, मौसम चक्र बदल रहे हैं। यह कोई प्राकृतिक परिवर्तन नहीं, यह हमारे गुनाहों का नतीजा है।

सोचिए, जब एक माँ का शरीर बुखार से तपता है, तो हम कितने चिंतित हो जाते हैं। लेकिन जब पूरी धरती जल रही है, तब हम क्यों चुप हैं? क्यों हम अब भी एयर कंडीशनर और गाड़ियों में जी रहे हैं, जबकि बाहर का तापमान इंसानी सहनशक्ति से बाहर हो चुका है?

7. पर्यावरण की आत्मा: मिट्टी, हवा और जल

मिट्टी, जो हमें अन्न देती है, अब बंजर होती जा रही है। हवा, जो हमें साँसें देती है, अब ज़हर से भरी है। जल, जो हमें जीवन देता है, अब पैसा बन गया है। यह कैसी दुनिया बना ली है हमने?

दिल्ली, लखनऊ, पटना, मुंबई – इन महानगरों में अब हवा सांस नहीं देती, बल्कि बीमारी देती है। नदियाँ अब जल का नहीं, कचरे का बहाव बन चुकी हैं। और खेत अब रसायनों के जहर से कराह उठे हैं।

8. बच्चों की आँखों में हरी धरती का सपना नहीं

हमारे बचपन में हरियाली, खेत, बाग, तालाब, नदी, और अमराइयाँ हुआ करती थीं। लेकिन आज के बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर ही जंगल देखते हैं, किताबों में ही नदियाँ पढ़ते हैं। क्या हम उन्हें एक ज़हरीली, सूखी, और कंक्रीटी दुनिया देकर जा रहे हैं?

कल जब एक बच्चा अपनी किताब में पेड़ की तस्वीर देखेगा, तो क्या वो अपने आस-पास वैसा पेड़ पाएगा? जब वह कविता में कोयल की आवाज़ पढ़ेगा, तो क्या वो सच में कभी सुन पाएगा? शायद नहीं — और यह सोच कर दिल काँप उठता है।

9. उम्मीद की हरियाली: अब भी देर नहीं हुई

इस दर्द, इस सिसकती प्रकृति के बीच, एक किरण अब भी बची है — हमारी चेतना की किरण। अगर हम आज नहीं जागे, तो कल शायद जागने के लिए धरती ही न बचे।

हर एक व्यक्ति अगर एक पेड़ लगाए, पानी बचाए, प्लास्टिक का त्याग करे, तो बदलाव संभव है। पर्यावरण दिवस सिर्फ एक दिन न बनकर अगर हमारी ज़िंदगी की सोच बन जाए, तो हर दिन हरियाली का त्योहार हो सकता है।

10. भावनात्मक अपील: धरती माँ की चिट्ठी उसके बच्चों के नाम

“प्यारे बच्चों,

मैं तुम्हारी माँ धरती हूँ। तुम्हें जन्म दिया, पाला, फूलों से सजाया, जल से सींचा और वायु से प्राण दिए। लेकिन आज मैं बीमार हूँ। मेरी साँसें घुट रही हैं, मेरा शरीर तप रहा है, मेरी आँखों में आँसू हैं।

तुम्हारे खेल, तुम्हारे सपने, तुम्हारे गीत — सब कुछ मैंने सँवारा, लेकिन आज तुमने मुझे ही भुला दिया।

क्या तुम फिर से मुझे अपना बना सकते हो? क्या तुम फिर से मुझे फूलों, पेड़ों, नदियों और पक्षियों से भर सकते हो?

मैं अब भी तुम्हारे इंतज़ार में हूँ…

तुम्हारी धरती माँ”

लेखक – राहुल मौर्या 

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