जीवनसाथी : आख़िरी सांस तक निभाया जाने वाला सबसे पवित्र वादा
सुबह का समय था… लगभग 5 बजने को थे। आसमान अभी पूरी तरह जगा नहीं था। चिड़ियों की चहचहाहट तो दूर… मानो हवा भी उनींदी-सी थी। तभी फोन की तेज़ रिंगटोन ने मेरी नींद को झकझोरकर रख दिया।
मैंने बिना कॉल रिसीव किया,
“हैलो… कौन…?”
उधर से कांपती आवाज़ आई —
“अरे जल्दी उठ… पापा का एक्सीडेंट हो गया है… हॉस्पिटल चलना है…”
ये आवाज़ मेरे दोस्त विशाल की थी। उसकी आवाज़ में डर, बेचैनी और घबराहट साफ झलक रही थी। मैं बिना कुछ पूछे, नींद को आँखों में ही छोड़ कर घर से निकल पड़ा। रास्ते भर हम दोनों चुप थे… बस हॉस्पिटल पहुँचने की जल्दी थी। जब हम हॉस्पिटल पहुंचे और हम भागते हुए इमरजेंसी वार्ड में पहुंचे। वहाँ नर्स और डॉक्टर्स भागदौड़ में लगे थे।
हमें देखकर डॉक्टर ने कहा —“चिंता मत करिए… इनके पैर में फ्रैक्चर है, पर खतरे से बाहर हैं।”
विशाल की सांस जैसे वापसी यात्रा पर लौट आई हो। उसने सिर झुकाकर भगवन का शुक्र अदा किया।
मैंने भी राहत की सांस ली।
डॉक्टर और नर्स के चले जाने के बाद विशाल अपने पापा को प्लास्टर लगवाने ले गए ।
कुछ देर तक मैं उसे ढांढस बंधाता रहा… पर मेरे ध्यान को अचानक किसी ओर खिंचाव-सा महसूस हुआ।
वह दृश्य जिसने मेरे दिल को झकझोर दिया
इमरजेंसी वार्ड के एक कोने में एक बुजुर्ग मरीज लेटा था। उसके चेहरे पर सफेदी का बोझ… हाथ-पैर में पट्टियाँ… और ऑक्सीजन मास्क लगा हुआ था। शायद समय ने उसके शरीर को थका दिया था… लेकिन उसके पास बैठी एक स्त्री थकने का नाम नहीं ले रही थी।
उसकी आँखों में नींद नहीं थी… पर चिंता थी।
उसके चेहरे पर थकान नहीं थी… पर दर्द था।
उसके हाथों में कांप थी… पर प्यार की मजबूती थी।
वह कभी उनके पैरों को सहलाती,
कभी सिर पर हाथ फेरती,
कभी डॉक्टर को रोककर घबराती आवाज़ में पूछती —
“डॉक्टर साहब… इनके सांस ठीक है न?”
“कुछ ज्यादा नुकसान तो नहीं हुआ?”
“इनको दर्द तो नहीं हो रहा…?”
डॉक्टर जाते तो वह फिर अपने पति के माथे को छूती और धीरे से कहती —
“मैं हूँ ना… कुछ नहीं होगा आपको…”
उनकी उम्र क्या होगी… लगभग 55-60 साल। कपड़े साधारण पर हाथ में शादी की लाल चूड़ियाँ थीं।
उन चूड़ियों का हर बजना… जैसे यह कह रहा हो —
“सात फेरे चाहे साल भूल जाएँ…
पर वो वचन… मैं नहीं भूलती…”
बिना किसी का साथ — वह अकेली
मैंने इधर-उधर नज़रें दौड़ाईं —
न कोई बेटा…
न कोई बेटी…
न कोई रिश्तेदार…
न कोई पड़ोसी…
हॉस्पिटल में सिर्फ वही थी —
एक पत्नी
एक जीवनसाथी
एक अडिग पहरेदार
एक प्रार्थना की मूर्ति
वह अपनी दुनिया को पुकार रही थी —
“उठो… मुझे डर लग रहा है…”
“तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूँगी?”
पर वह दुनिया — कोमल-सी सांसें लेकर,
बिसतर पर खामोश पड़ी थी।
पति-पत्नी का असली अर्थ
हमने देखा है
शादी के समय बड़ी-बड़ी बातें होती हैं —
“जीवन भर साथ निभाएँगे…”
“सुख-दुख में साथ रहेंगे…”
“बीमारी में भी साथ छोड़कर नहीं जाएंगे…”
पर असल परीक्षा तब होती है
जब हालात हमें आज़माते हैं।
और आज…
वह साधारण-सी दिखने वाली औरत
अपनी परीक्षा में उच्चतम अंक लेकर खड़ी थी।
उसके कपड़ों में त्याग था,
उसकी साड़ी की सिलवटों में संघर्ष,
उसके चेहरे की झुर्रियों में समय की मार,
और उसके हाथों की पकड़ में भरोसा —
जीवनभर का भरोसा!
स्त्री का असली रूप — जीवनसाथी
हम अकसर कहते हैं —
“पति-पत्नी का रिश्ता प्यार का होता है।”
लेकिन सच कहें तो
यह रिश्ता प्यार से ज्यादा…
समर्पण का रिश्ता होता है।
वह स्त्री तभी से जीवनसाथी होती है
जब वह शादी के बाद…
घर में सिर्फ दुल्हन बनकर नहीं आती,
बल्कि पति की दवा, दुआ और दोस्त बनकर आती है।
वह अपने पति की हर कमी को पूरा करती है —
कभी माँ बनकर
कभी बहन बनकर
कभी सहारा बनकर
कभी छाया बनकर
वह अपने आँसू छिपा लेती है
पर पति का दर्द एक पल भी छिपा नहीं पाती।
वह औरत — ममता से भरा एक संसार
डॉक्टर ने जब बताया कि मरीज की हालत थोड़ी गंभीर है
तो वह औरत घबरा गई।
उसने तुरंत डॉक्टर का हाथ पकड़ लिया —
“डॉक्टर साहब… आप बस इनको बचा लीजिए…
इनके बिना मेरा कोई नहीं…”
यह सुनते ही मैं सोचे बिना नहीं रह पाया —
कितनी बार हम मर्द इस प्यार को समझ ही नहीं पाते।
हम समझते हैं —
बीवी का काम सिर्फ खाना बनाना,
घर संभालना,
बच्चों को पालना है…
पर असल में —
वह हमें जीना सिखाती है
हमें बिखरने से बचाती है
और जब हम टूटते हैं तो
वह अपने आप को ताक पर रखकर
हमें समेटने में लग जाती है।
प्यार की सबसे मार्मिक परिभाषा
प्यार वह नहीं
जो हँसते-खेलते दिन में हो…
प्यार वह है —
जो दर्द और रात के अंधेरे में भी
डटा रहता है।
प्यार वह नहीं
जो सोशल मीडिया की तस्वीरों में दिखे…
प्यार वह है —
जो हॉस्पिटल और इंजेक्शन की पीड़ा में भी
साथ न छोड़े।
वह औरत आज
प्यार की सबसे सुंदर मिसाल थी।
लेकिन उसके चेहरे पर शिकायत नहीं थी।
वह रो नहीं रही थी…
बस यह कह रही थी —
“मेरे पति हैं…
मैं हूँ तो ये भी ठीक हो जाएंगे…”
कितनी सरल सोच…
कितना विशाल विश्वास…
समय ने बता दिया — कौन अपना होता है
आजकल के समय में
यदि पति बीमार पड़े तो
बच्चों को छुट्टी नहीं मिलती,
रिश्तेदारों को समय नहीं मिलता,
और दोस्तों को काम पड़ जाता है…
पर पत्नी —
चाहे वह खुद बीमार हो
चाहे पैसों की तंगी हो
चाहे दुनिया कुछ भी कहे
वह बस यह सोचती है —
“मेरा पति ठीक रहना चाहिए।”
यही कारण है —
माँ के बाद सबसे बड़ी ममता
जीवनसाथी में ही बसती है।
क्या कभी किसी ने इस अदृश्य त्याग को सलाम किया?
बेटा कमाने जाता है
तो सब कहते — “वाह! बेटा कमाता है।”
बेटी डॉक्टर बनती है
तो कहते — “वाह! खूब नाम कमा रही है।”
पर पत्नी?
वह जो सालों साल
रातों की नींद
और अपने सपनों का त्याग कर देती है —
उसके लिए कोई ताली नहीं बजती।
कभी सोचा है?
वह क्यों बिना शर्त साथ रहती है?
क्योंकि —
वह सिर्फ पत्नी नहीं…
वह जीवन की रखवाली है।
पति गिर जाए तो वह ढाल बन जाती है
जब पति हँसता है
तो वह हँसी और बढ़ा देती है।
जब पति उदास हो
तो वह अपने आँसू छिपाकर
उसे हँसाने की कोशिश करती है।
जब पति बीमार पड़ता है
तो वह अपनी अधूरी दवाइयों को छोड़कर
पहले पति की दवाई ले आती है।
यह रिश्ते की सबसे अनकही कहानी है —
“वह हमेशा हमें बचाती है…
लेकिन हम उसे समझने में देर कर देते हैं…”
वह स्त्री टूटी नहीं — और मजबूत दिखी
कई घंटे हो चुके थे।
सुबह का उजाला आया और शाम ढलने लगी।
पर मैं जाते-जाते उस स्त्री के पास फिर गया।
मैंने उसके पति के बारे में पूछा।
उसने धीमे स्वर में कहा —
“कोई नहीं है उनका सिवा मेरे…
बच्चे नौकरी कर रहे,
पर समय किसके पास?”
उसने आगे कहा —
“…पर मुझे क्या चाहिए,
बस यह ठीक हो जाएँ।
मेरा जीवन तो ये ही हैं।”
उसकी आँखों में आँसू थे
पर होठों पर मुस्कान —
और यह मुस्कान
मुझे किसी मंदिर की घंटी से भी पवित्र लगी।
जाते-जाते मैंने खुद से एक सवाल पूछा
दुनिया में हर कोई कहता है —
“बीवी तो मिल जाएगी… दूसरी…”
पर क्या सच में?
क्या कोई दोबारा ऐसा समर्पण मिल सकता है?
क्या कोई दूसरी स्त्री
यूँ ही रात-रात भर जागकर
आपकी सांसें गिन सकती है?
नहीं…
ऐसा त्याग न तो बाज़ार में मिलता है
न किसी दौलत से खरीदा जा सकता है।
पत्नी… एक ऐसी दौलत है
जो यदि एक बार खो जाए
तो फिर कभी नहीं मिलती।
निष्कर्ष — उस स्त्री को सलाम!
आज मैं ने एक चीज़ सीख ली —
धन, दौलत, नाम, शोहरत…
सब बेकार हैं
अगर आख़िरी वक़्त में
आपके पास एक जीवनसाथी साथ न हो।
वह औरत
आज मेरे लिए आदर्श है —
क्योंकि उसने यह साबित कर दिया —
सच्चा प्यार
लव स्टोरी का हिस्सा नहीं होता,
हॉस्पिटल की इस बिस्तर के किनारे बैठकर
पल-पल दुआ करने वाली पत्नी होती है।
अंत में बस इतना कहना है…
अगर ईश्वर ने आपको
एक समझदार और समर्पित जीवनसाथी दिया है
तो उसे हल्के में मत लीजिए।
उसके हर त्याग का सम्मान कीजिए।
उसकी कद्र कीजिए…
क्योंकि एक दिन —
जब हम खुद चलने-फिरने लायक नहीं होंगे,
तब वह ही होगी
जो हमारे पैरों में तेल लगाएगी,
हमारे माथे को सहलाएगी
और डॉक्टर से पूछेगी —
“मेरे पति ठीक तो हो जाएंगे न?”
यही प्यार है…
यही विवाह है…
यही जीवनसाथी होना है।
समापन
आज उस महिला को देखकर
मेरी सोच बदल गई।
मैंने दिल से कहा —
“हर पत्नी को,
हर उस जीवनसाथी को
जो आख़िरी सांस तक साथ निभाती है —
सलाम!”
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लेखक – राहुल मौर्या
