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दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण और मुख्यमंत्री के बयान बने सियासी बहस का मुद्दा

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दिल्ली की हवा एक बार फिर ज़हरीली होती जा रही है। लगातार 400 के पार जा रहा एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) न सिर्फ आम जनता की सेहत पर भारी पड़ रहा है, बल्कि अब यह मुद्दा राजनीतिक बहस और जनआक्रोश का भी केंद्र बन चुका है। इसी कड़ी में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के हालिया बयानों और कार्यशैली को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

सीआईबी इंडिया न्यूज़ से बातचीत के दौरान दिल्ली की जनता ने खुलकर अपनी नाराज़गी जाहिर की। लोगों का कहना है कि राजधानी जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण शहर में प्रदूषण जैसे गंभीर मुद्दे पर सरकार की तैयारी और समझ दोनों कमजोर दिखाई दे रही हैं। कई नागरिकों ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री द्वारा AQI को “आईक्यू” या “आईक्यूआई” कहना और इसे थर्मामीटर से मापने जैसी बातें करना बेहद हास्यास्पद और चिंताजनक है।

जनता का कहना है कि आज एक आठवीं–दसवीं कक्षा का बच्चा भी जानता है कि AQI क्या होता है और इसे कैसे मापा जाता है, लेकिन मुख्यमंत्री के बयान यह दर्शाते हैं कि या तो विषय की गंभीरता को नहीं समझा जा रहा या फिर जानबूझकर ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। कुछ लोगों ने इसे “लाइमलाइट में बने रहने की रणनीति” तक करार दिया।

प्रदूषण को लेकर सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठे। तंदूरी आइटम्स, अगरबत्ती या छोटे उपायों को बैन करने की बातों को जनता ने “मूल समस्या से ध्यान हटाने वाला कदम” बताया। लोगों का कहना है कि दिल्ली में असली प्रदूषण की वजह वाहनों की अत्यधिक संख्या, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्य और कचरे के पहाड़ हैं, जिन पर ठोस और सख्त फैसलों की जरूरत है।

कई नागरिकों ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कार्यकाल की भी चर्चा की। हालांकि कुछ लोगों ने उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरा बताया, लेकिन यह भी माना कि उनके समय में ऑड-ईवन योजना, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों जैसे कदमों से कम से कम जनता को यह महसूस होता था कि सरकार कुछ प्रयास कर रही है। वहीं मौजूदा सरकार पर यह आरोप लगा कि यमुना की सफाई, महिलाओं को ₹2500 देने जैसे वादों पर अब तक कोई ठोस अमल नहीं दिख रहा।

जनता का कहना है कि आज स्थिति यह है कि लोग घरों में एयर प्यूरीफायर लगाने और बाहर मास्क पहनने को मजबूर हैं। बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए दिल्ली में रहना मुश्किल होता जा रहा है।

कुल मिलाकर, दिल्ली में बढ़ता प्रदूषण और मुख्यमंत्री के बयानों ने सरकार की गंभीरता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। लोग चाहते हैं कि राजनीतिक बयानबाज़ी छोड़कर सरकार ठोस, वैज्ञानिक और प्रभावी कदम उठाए, ताकि देश की राजधानी को “गैस चैंबर” बनने से बचाया जा सके।

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