जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी सरगर्मियां भी तेज होती जा रही हैं। आज़मगढ़ जिले में भी राजनीतिक पारा लगातार चढ़ रहा है। खासतौर पर अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र में मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है। यहां अपनी राजनीतिक संभावनाएं तलाश रहे कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर के बेटे अरूण राजभर ने पूरी ताकत झोंक दी है।
अरूण राजभर लगातार गांव-गांव घूमकर जन चौपाल के माध्यम से जनता से सीधे संवाद कर रहे हैं। उनका सीधा मुकाबला समाजवादी पार्टी के तीन बार के विधायक डॉ. संग्राम यादव से माना जा रहा है, जिनकी गिनती सपा प्रमुख अखिलेश यादव के करीबी नेताओं में होती है।
अतरौलिया विधानसभा क्षेत्र से है, जहां अरूण राजभर की जन चौपाल राजनीति धीरे-धीरे चर्चा का विषय बनती जा रही है। इसी क्रम में कनैला गांव में आयोजित जन चौपाल में ग्रामीणों ने खुलकर अपनी समस्याएं सामने रखीं। गांववासियों ने बताया कि इंटरलॉकिंग, नाली, आरसीसी सड़क, आवास, शौचालय, पेंशन और राशन कार्ड जैसी बुनियादी समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। हर चुनाव में नेता आते हैं, वादे करते हैं, लेकिन स्थायी समाधान नहीं हो पाता।
ग्रामीणों ने विशेष रूप से नरिया–सिकंदरपुर मार्ग का मुद्दा उठाया, जो कमरिया घाट तक जाता है। लोगों का कहना था कि यह सड़क लंबे समय से जर्जर हालत में है। शादी-ब्याह हो या किसी की मृत्यु, इसी रास्ते से घाट जाना पड़ता है, लेकिन खराब सड़क के कारण घंटों लग जाते हैं और हादसे भी हो चुके हैं। सड़क के नाम पर राजनीति तो खूब हुई, लेकिन जमीनी काम नहीं दिखा।
जन चौपाल को संबोधित करते हुए अरूण राजभर ने बताया कि छह महीने पहले ग्रामीणों ने उन्हें इस सड़क को लेकर पत्र दिया था। उस समय उन्होंने साफ कहा था कि जब तक निर्माण कार्य शुरू नहीं होगा, वह दोबारा क्षेत्र में नहीं आएंगे। अब पांच किलोमीटर सड़क के लिए धन स्वीकृत हो चुका है और निर्माण कार्य जल्द शुरू होगा। उन्होंने इसका श्रेय ओम प्रकाश राजभर के प्रयासों को दिया।
हालांकि ग्रामीणों ने यह सवाल भी उठाया कि मुख्य सड़क तो बन रही है, लेकिन गांव के अंदर की सड़कें अब भी बदहाल हैं। अरूण राजभर ने भरोसा दिलाया कि इन मुद्दों को शासन और अधिकारियों के सामने उठाया जाएगा और यह भी पता लगाया जाएगा कि विकास का पैसा गांव तक क्यों नहीं पहुंच रहा।
कुल मिलाकर, कनैला की जन चौपाल में समस्याएं भी सामने आईं और समाधान की उम्मीद भी जगी। अब देखना यह है कि सियासी वादे कब जमीन पर उतरते हैं और जनता को वास्तविक राहत कब मिलती है।
