“स्कूल वाला प्यार “
बचपन के वो दिन सुहाने,
स्कूल के संग थे जो जाने।
बैग में किताबें, मन में सपने,
मासूमियत के थे अपने किस्से।
इस पद में स्कूल के सुनहरे दिनों की याद को दर्शाया गया है, जब हम किताबों से भरा बैग लेकर सपनों को संजोए स्कूल जाते थे। यह बचपन की मासूमियत और उन दिनों की खास यादों का प्रतीक है।
वो पहली नज़र, वो हल्की हँसी,
पेन गिराकर उठाने की बेबसी।
नोट्स के बहाने बातें बनाना,
दिल की बातों को कागज़ पर लाना।
इस भाग में पहले-पहले प्यार की मासूम झलक दिखाई गई है, जब नज़रें मिलती थीं, हँसी होती थी, और किसी के करीब जाने का एक छोटा-सा बहाना भी खास लगता था। कभी पेन गिराना, कभी नोट्स के बहाने बात करना—ये सब स्कूल वाले प्यार की निशानियाँ थीं।
टिफिन में टॉफी रखकर देना,
बिना कहे सब कुछ समझ लेना।
वो बेंच पर नाम उकेर देना,
हर लम्हे को खास कर लेना।
यहां दोस्ती और प्यार के छोटे-छोटे लेकिन गहरे इशारों का ज़िक्र किया गया है। टिफिन में टॉफी रखना, बिना कुछ कहे ही एक-दूसरे की भावनाएँ समझ लेना, और स्कूल की बेंच पर किसी खास का नाम लिख देना—ये सब उस मासूम प्यार के यादगार पल होते थे।
परीक्षा के डर में संग पढ़ाई,
छोटी-छोटी खुशियों की कमाई।
शरारतों में छुपा था अपनापन,
कभी न भूले वो प्यारा बंधन।
इस हिस्से में परीक्षा के दिनों की बातें हैं, जब डर के बावजूद साथ पढ़ाई करने का बहाना मिल जाता था। छोटी-छोटी बातें ही हमें खुशी देती थीं, और उन शरारतों में एक अपनापन छुपा रहता था। यह प्यार और दोस्ती का वह बंधन था, जो हमेशा के लिए दिल में बस जाता है।
वक़्त के संग सब बदल गया,
स्कूल छूटा, जीवन निकल गया।
पर दिल के किसी कोने में आज भी,
वो मासूम सा प्यार पलता मिला।
यह अंतिम भाग है, जिसमें बताया गया है कि समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। स्कूल खत्म हो जाता है, लोग अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन वह पहला मासूम प्यार हमेशा दिल के किसी कोने में जिंदा रहता है, जिसे याद कर आज भी मुस्कान आ जाती है।
लेखक – राहुल मौर्या
