उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की सुजौली की यह तस्वीर सिर्फ एक टूटी सड़क की कहानी नहीं है, बल्कि उन टूटे हुए वादों की गूंज है, जो हर चुनाव में जनता से किए जाते हैं। विकास के बड़े-बड़े दावों और योजनाओं के बीच यह सड़क आज भी अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। धूल उड़ाती पगडंडी, गड्ढों से भरा रास्ता और हर कदम पर खतरे का एहसास—यहां के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
जब देश डिजिटल इंडिया और एक्सप्रेसवे की बात कर रहा है, तब इस क्षेत्र के लोग आज भी जान हथेली पर रखकर सफर करने को मजबूर हैं। यह सिर्फ एक सड़क नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता, प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक वादों के खोखलेपन की जीती-जागती मिसाल है।
बहराइच जिले के जंगल क्षेत्र से होकर गुजरने वाली करीब 9 किलोमीटर लंबी सड़क आज पूरी तरह बदहाल स्थिति में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सड़क दशकों से इसी हालत में है और कई सरकारें आईं और गईं, लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है।
ग्रामीण रवि पांडे बताते हैं कि “जब से हमने होश संभाला है, तब से सड़क ऐसी ही है। हर चुनाव में नेता आते हैं, वादा करते हैं और चले जाते हैं, लेकिन सड़क नहीं बनती।” वहीं सुधीर कुमार शुक्ला का कहना है कि उन्होंने 7 मार्च को तहसील दिवस में ज्ञापन दिया था और एक महीने में काम शुरू करने का आश्वासन मिला था, लेकिन दो महीने बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इस सड़क की खराब स्थिति के कारण लोगों को रोजमर्रा के कामों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। एक ओर जहां खराब सड़क के कारण दूरी बढ़ जाती है, वहीं जंगल क्षेत्र होने के कारण जंगली जानवरों का भी खतरा बना रहता है। ग्रामीणों के अनुसार, इस रास्ते से जाने पर करीब 16-17 किलोमीटर की दूरी बचती है, लेकिन सड़क इतनी खराब है कि लोग जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर हैं।
स्थानीय निवासी कलीम अंसारी बताते हैं कि “इस रास्ते पर चलना किसी खतरे से कम नहीं है। गड्ढों में फंसने का डर अलग और जंगल में जानवरों का खतरा अलग।”
सबसे गंभीर समस्या तब सामने आती है जब गर्भवती महिलाओं या मरीजों को अस्पताल ले जाना होता है। ग्रामीणों का कहना है कि कई बार खराब सड़क के कारण एंबुलेंस में ही प्रसव हो जाता है, जिससे मां और बच्चे दोनों की जान खतरे में पड़ जाती है।
शिक्षा पर भी इस सड़क का बुरा असर पड़ रहा है। कोचिंग संचालक ब्रज किशोर शुक्ला बताते हैं कि “बच्चे दूर-दूर से पढ़ने आते हैं, लेकिन खराब सड़क के कारण कई बार समय पर नहीं पहुंच पाते। हाल ही में एक छात्र का बाइक का पहिया टूट गया, जिससे वह बोर्ड परीक्षा में देर से पहुंचा।”
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस सड़क के निर्माण में विभागीय विवाद भी बाधा बन रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि यह क्षेत्र वन विभाग के अंतर्गत आता है, जिसके कारण पीडब्ल्यूडी और वन विभाग के बीच तालमेल नहीं बन पा रहा है। एक स्थानीय कार्यकर्ता ने बताया कि “कभी पीडब्ल्यूडी काम शुरू करता है तो वन विभाग रोक देता है, और इसी खींचतान में सड़क का काम अटका हुआ है।”
राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है। क्षेत्र में पिछले 10 वर्षों से भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, जबकि केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है। इसके बावजूद विकास कार्यों का अभाव लोगों के गुस्से को बढ़ा रहा है।
ग्रामीणों ने पूर्व सरकारों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव और मायावती के कार्यकाल में भी इस सड़क की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। वहीं वर्तमान सरकार से भी लोग निराश नजर आ रहे हैं।
एक स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता ने भी स्वीकार किया कि “हमने कई बार शिकायत की, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिला। अब जनता में नाराजगी बढ़ रही है।”
स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब ग्रामीणों ने आगामी चुनाव के बहिष्कार की चेतावनी दे दी है। उनका साफ कहना है कि अगर जल्द सड़क निर्माण नहीं हुआ तो वे मतदान नहीं करेंगे।
बहराइच की यह तस्वीर सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की हकीकत है जहां विकास के दावे और जमीनी सच्चाई में बड़ा अंतर दिखाई देता है। अब देखना होगा कि सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर कितनी गंभीरता दिखाते हैं, या फिर यह सड़क यूं ही लोगों की परेशानियों का कारण बनी रहेगी।
