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एक आख़िरी ख़त

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एक आख़िरी ख़त

दिल करता है तुम्हें एक आख़िरी ख़त लिखूँ। पर हर बार क़लम उठाते ही हाथ काँप जाता है। शब्द सामने खड़े होकर पूछते हैं—क्या लिखूँ? तुम्हें लिखूँ या तुम्हारी यादों को? तुम्हारे होने को लिखूँ या तुम्हारे न होने के उस सन्नाटे को, जो हर रात मेरे कमरे में आकर बैठ जाता है। यह कोई कहानी नहीं है, यह कोई उपन्यास नहीं है। यह एक इंसान की आत्मा है, जो बहुत दिनों से ख़ामोश थी और आज लिखते-लिखते बोल पड़ी है।

मैं जब भी काग़ज़ के सामने बैठता हूँ, समय अजीब तरह से धीमा हो जाता है। घड़ी की सुइयाँ जैसे बोझिल होकर चलने लगती हैं। बाहर की दुनिया अपनी रफ़्तार से चलती रहती है, लेकिन मेरे कमरे के भीतर सब कुछ ठहर जाता है। यहाँ सिर्फ़ मैं होता हूँ, काग़ज़ होता है, और तुम्हारी यादें होती हैं। तुम्हारा नाम लिखने से डर लगता है, क्योंकि नाम लिखते ही तुम्हारा चेहरा सामने आ जाता है। और चेहरा आते ही आँखें नम हो जाती हैं। इसलिए हर बार लिखने की शुरुआत इसी वाक्य से होती है—दिल करता है तुम्हें एक आख़िरी ख़त लिखूँ।

अगर मैं तुम्हें लिखूँ, तो क्या लिखूँ? तुम्हारी मुस्कान, जो कभी मेरे हर डर को छोटा कर देती थी? या तुम्हारी चुप्पी, जो आज भी मेरे भीतर सबसे ज़्यादा शोर करती है? तुम्हें लिखना आसान नहीं है। क्योंकि तुम्हें लिखते-लिखते मैं खुद को खोल देता हूँ। हर वाक्य में तुम्हारा होना है, और हर पूर्णविराम में तुम्हारा न होना। तुम्हें लिखना उस वक़्त को दोबारा जीना है, जब तुम पास थीं और मुझे यह अंदाज़ा भी नहीं था कि पास होना कितना नाज़ुक और अस्थायी होता है।

और अगर तुम्हें नहीं, तो क्या तुम्हारी यादों को लिखूँ? यादें… कुछ यादें इतनी हल्की होती हैं कि हवा में घुल जाती हैं, और कुछ इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल कर देती हैं। तुम्हारी यादें दूसरी क़िस्म की हैं। वह पहली बातचीत, जो रात भर चली। वह पहली हँसी, जो बिना वजह फूट पड़ी। वह पहला झगड़ा, जो बिना माफ़ी के भी ख़त्म हो गया। उन यादों को लिखते-लिखते समझ आता है कि इंसान किसी इंसान से नहीं हारता, वह उसकी यादों से हारता है।

रातें हमेशा तुम्हारी रहीं। दिन में दुनिया का शोर था—काम, लोग, ज़िम्मेदारियाँ। लेकिन रात में सिर्फ़ तुम थीं। हमने कितनी रातें यूँ ही बातों में बिता दीं—बिना किसी मंज़िल के, बिना किसी डर के। उन रातों में भविष्य की कोई चिंता नहीं थी। बस यह यक़ीन था कि जो अभी है, वही काफ़ी है। आज वही रातें सबसे लंबी लगती हैं। मोबाइल की स्क्रीन बुझ जाती है, लेकिन तुम्हारी याद नहीं। अँधेरे में भी तुम्हारा चेहरा साफ़ दिखाई देता है, और ख़ामोशी में भी तुम्हारी आवाज़ सुनाई देती है।

तेरे न होने का एहसास… यह भी अजीब चीज़ है। न होना भी एक तरह की मौजूदगी है। तुम्हारे न होने से मैंने यह सीखा कि ख़ालीपन भी आवाज़ करता है। वह हर सुबह जगाता है, हर रात सुलाता है। तुम्हारे न होने का एहसास हर उस चीज़ में है, जो अधूरी रह गई—अधूरी बातें, अधूरे वादे, अधूरे ख़्वाब। कई बार लगता है कि तुम चली गईं, लेकिन तुम्हारा खालीपन यहीं रह गया, मेरे भीतर।

अगर तुम्हारे बारे में कुछ भी पूरा लिख पाऊँ, तो वह तुम्हारी आँखें होंगी। उन आँखों में सवाल भी थे, जवाब भी। सुकून भी था, और तूफ़ान भी। उन आँखों में देख कर लगता था कि दुनिया की कोई बात मुश्किल नहीं। आज भी जब आँखें बंद करता हूँ, वही आँखें सामने आ जाती हैं—कुछ कहती हुई, कुछ छुपाती हुई। शायद इसलिए अब मैं किसी और की आँखों में देर तक देख नहीं पाता।

पल… घड़ी में क़ैद कुछ सेकंड, जो यादों में उम्र बन जाते हैं। तुम्हारे साथ बिताया हर पल ऐसा ही था—छोटा-सा, लेकिन हमेशा के लिए। चाय की प्याली, सड़क किनारे की चुपचाप बैठी शामें, बेवजह की हँसी, और अचानक गहरी हो जाने वाली बातें। अब वही पल सबसे ज़्यादा चुभते हैं, क्योंकि वे लौटकर नहीं आते।

तुमने जानबूझकर कभी दर्द नहीं दिया। लेकिन दर्द को वजह नहीं चाहिए होती। कभी-कभी सिर्फ़ बदल जाना ही काफ़ी होता है। तुम बदल गईं, और मैं वहीं रह गया—तुम्हारे पुराने रूप के साथ। तुम्हारे बदले हुए आज में मेरा कोई हिस्सा नहीं था, इसलिए मैं अपने कल में ही जीता रहा।

तुम्हारी हँसी में एक अजीब-सा जादू था। वह हँसी मेरे सारे डर छीन लेती थी। आज भी जब कहीं वैसी हँसी सुनता हूँ, दिल ठहर-सा जाता है। एक पल के लिए लगता है कि शायद तुम ही हो, लेकिन अगले ही पल सच सामने आ खड़ा होता है—तुम नहीं हो।

हमारी बातें कभी सिर्फ़ बातें नहीं रहीं। वे दिल से निकलकर रूह तक पहुँच जाती थीं। अब वही बातें सबसे ज़्यादा याद आती हैं, क्योंकि आजकल लोग बातें तो करते हैं, लेकिन महसूस नहीं करते। तुम्हारे साथ हर बातचीत के बाद लगता था कि कुछ और जी लिया।

तुम्हारे बाद मैं कैसा हो गया—यह लिखना भी ज़रूरी है। बाहर से मैं वही हूँ, भीतर से बिल्कुल अलग। हँसता हूँ, बोलता हूँ, काम करता हूँ, लेकिन यह सब जैसे किसी और के लिए कर रहा हूँ। अपने लिए जो जीना था, वह कहीं पीछे छूट गया। अब ज़िंदगी निभाई जाती है, जीयी नहीं जाती।

लोग कहते हैं—वक़्त सब ठीक कर देता है। लेकिन वक़्त ने सिर्फ़ आदत डलवाई है, इलाज नहीं किया। दर्द अब भी है, बस अब वह चुपचाप रहता है। कभी किसी गाने में, कभी किसी ख़ामोश शाम में, वह अचानक लौट आता है।

अब यह भी सच है कि तुम्हारी शादी को तीन साल हो चुके हैं। यह वाक्य लिखते हुए भी क़लम रुक जाती है। तीन साल… वक़्त बहुत होता है, पर कुछ लोगों के लिए नहीं। इन तीन सालों में तुम आगे बढ़ चुकी हो। तुम्हारी ज़िंदगी में नए रिश्ते हैं, नई ज़िम्मेदारियाँ हैं। और मैं… मैं अब भी सीख रहा हूँ कि कैसे स्वीकार किया जाए।

मैंने इन तीन सालों में कभी तुम्हारी दुनिया में झाँकने की कोशिश नहीं की। न तुम्हारी ख़ुशियों का हिसाब रखा, न तुम्हारे दुखों का। फिर भी कहीं न कहीं पता चलता रहा कि तुम ठीक हो। और शायद यही सबसे बड़ा सुकून भी है, और सबसे गहरा दर्द भी।

कभी-कभी सोचता हूँ—जिस ज़िंदगी में अब तुम्हारा नाम किसी और के साथ लिया जाता है, वहाँ मेरी याद का क्या स्थान होगा? शायद कोई नहीं। और यही सच स्वीकार करना मेरी सबसे बड़ी परिपक्वता है।

इन तीन सालों में बहुत कुछ बदला है—लोग, रिश्ते, हालात। लेकिन एक चीज़ नहीं बदली—मेरे भीतर तुम्हारा होना। वह वैसा ही है, जैसा पहले दिन था। न कम, न ज़्यादा।

अब इस ख़त में कोई शिकायत नहीं है। कोई सवाल नहीं है। बस एक शांति है—कि जो था, वह सच्चा था। और जो नहीं हुआ, वह शायद ज़रूरी नहीं था।

अब सच में क़लम रख रहा हूँ। क्योंकि कुछ कह लेने के बाद भी बहुत कुछ कहने को रह जाता है। और शायद यही मोहब्बत की आख़िरी सच्चाई है।

तेरे न होने का भी एक अजीब असर है मुझ पर,
तू दूर होकर भी हर पल मेरे भीतर है।
लोग कहते हैं भूल जाओ उसे वक़्त के साथ,
पर वक़्त ही तो है जो हर रोज़ तेरा नाम लिखता है।

 

लेखक – राहुल मौर्या 

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