देश में गौ माता के मुद्दे को लेकर संत समाज के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। शंकराचार्य ने इस विषय पर सख्त रुख अपनाते हुए सभी संतों, धर्माचार्यों और प्रमुख धार्मिक संगठनों से 10 दिन के भीतर अपना स्पष्ट पक्ष सार्वजनिक करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि निर्धारित समयसीमा तक सभी यह घोषित करें कि वे गौ माता के पक्ष में हैं या नहीं, ताकि आगामी ‘धर्म युद्ध’ में पक्ष और प्रतिपक्ष स्पष्ट हो सके।
शंकराचार्य ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी के उस बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री के साथ होने की बात कही थी। इस पर शंकराचार्य ने कहा कि यदि सभी अखाड़ों के साथ चर्चा हो चुकी है, तो उसका लिखित प्रस्ताव सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अन्यथा इसे केवल व्यक्तिगत मत ही माना जाएगा। उन्होंने कहा कि सत्ता और सत्य में अंतर होता है। सत्ता के साथ भीड़ हो सकती है, लेकिन सत्य अकेला होकर भी प्रभावी होता है।
इस दौरान शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी सीधे तौर पर मांग की कि वे सार्वजनिक रूप से गाय को ‘मां’ या ‘राज्य माता’ घोषित करें। उन्होंने कहा कि यदि राज्य के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति गाय को मां कहने में संकोच करते हैं, तो यह गौ संरक्षण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति गाय को केवल पशु सूची में रखकर संतुष्ट है और जो उसे मां कहता है, दोनों के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर है।
शंकराचार्य ने गौ रक्षा को लेकर ‘धर्म युद्ध’ की चेतावनी भी दी। उन्होंने संतों, महात्माओं और धर्मगुरुओं से निर्धारित तिथि से पहले अपना पक्ष तय करने को कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह संघर्ष किसी अन्य धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि गौ हत्या के मुद्दे पर केंद्रित है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि यह सब हिंदुओं के शासनकाल में हो रहा है, इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी हिंदू समाज के भीतर तय होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि ‘असली और नकली हिंदुओं’ की पहचान कराना है। उन्होंने कहा कि जो गाय को मां मानता है, वही उनका भाई है, जबकि जो ऐसा नहीं मानता, वह उनके साथ नहीं है।
शंकराचार्य ने दावा किया कि कई संतों और महंतों का समर्थन उन्हें प्राप्त हो रहा है और धीरे-धीरे यह स्पष्ट हो जाएगा कि कौन गौ रक्षा के पक्ष में खड़ा है। उन्होंने कहा कि उनका एजेंडा धार्मिक है और धर्म के मार्ग पर चलने वालों के साथ अंततः समाज स्वयं खड़ा होता है।
