“मोबाइल से नजदीकियां और रिश्तों का अंत”
कभी साथ बैठकर बातें होती थीं,
हंसी के बीच दिल की मुलाकातें होती थीं।
अब आँखें मिलती नहीं, बस स्क्रीन पर टिकी हैं,
रिश्ते भी वाई-फाई की रफ्तार में सिमटी हैं।
पहले लोग आमने-सामने बैठकर खुलकर बातें करते थे, हंसते थे और एक-दूसरे की भावनाओं को महसूस करते थे। लेकिन अब लोग मोबाइल स्क्रीन में इतने उलझ गए हैं कि आँखों से आँखें मिलाना भी कम हो गया है। रिश्ते डिजिटल दुनिया तक सिमट कर रह गए हैं।
चाय की चुस्कियों में जो मीठी गुफ्तगू थी,
अब नोटिफिकेशन की बीप में कहीं खो गई है।
हाथों में हाथ थामने की जो आदत थी,
अब फ़ोन के कवर में उलझ कर रह गई है।
पहले लोग साथ बैठकर चाय पीते हुए मीठी बातें किया करते थे, पर अब मोबाइल के नोटिफिकेशन की आवाज़ उन पलों को खत्म कर रही है। पहले प्यार और अपनापन हाथों में हाथ थामने से महसूस होता था, लेकिन अब लोग मोबाइल के कवर को ही ज्यादा छूते हैं।
दूरियाँ मिटाने का वादा था इस तकनीक का,
पर दिलों के फासले बढ़ा दिए अनजाने में।
साथ होते हुए भी जो अकेलापन है,
वो शब्दों में नहीं, निगाहों में बसा है।
मोबाइल और इंटरनेट को लोगों को जोड़ने के लिए बनाया गया था, लेकिन यह उल्टा रिश्तों में दूरी बढ़ाने का कारण बन गया। लोग शारीरिक रूप से साथ होते हुए भी अकेलापन महसूस करते हैं क्योंकि उनकी भावनाओं को कोई पढ़ नहीं पाता।
पलकों के पीछे छुपे जज़्बात अब कौन पढ़ेगा?
जब हर भावना इमोजी में बदल दी गई है।
रिश्ते थे जो कभी सादगी से महकते,
अब नेटवर्क की ताकत पर टिके हैं।
पहले लोग एक-दूसरे की आँखों में देखकर उनकी भावनाओं को समझते थे, लेकिन अब सब कुछ इमोजी तक सीमित हो गया है। रिश्तों की सुंदरता जो सादगी में थी, वह अब इंटरनेट और नेटवर्क के भरोसे चल रही है।
आओ, एक दिन इस मोबाइल को किनारे रखें,
फिर से उन पुरानी गलियों में लौट चलें।
जहाँ आवाज़ें थीं, मुस्कानें थीं बेवजह,
और दिलों में बसी थी सच्ची मोहब्बत की वजह।
कविता हमें यह संदेश देती है कि हमें कभी-कभी मोबाइल से दूर होकर असली जिंदगी में वापस लौटना चाहिए। उन पुराने दिनों की तरह जब लोग बेवजह हंसते थे, बातें करते थे और रिश्तों की सच्ची गर्माहट महसूस करते थे। मोबाइल को किनारे रखकर हमें फिर से रिश्तों को गहराई से जीने की जरूरत है।
कविता का सारांश:
यह कविता दिखाती है कि कैसे मोबाइल फोन और इंटरनेट के कारण रिश्तों में दूरी आ गई है। पहले लोग दिल से बातें किया करते थे, लेकिन अब स्क्रीन और टेक्स्ट तक सीमित हो गए हैं। भावनाएँ इमोजी में बदल गई हैं, और असली अपनापन कहीं खो गया है। अंत में, यह कविता हमें सचेत करती है कि हमें तकनीक के बीच भी अपने रिश्तों को जीवंत बनाए रखना चाहिए।
✍️ लेखक – राहुल मौर्या
