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‘डायमंड सिटी’ सूरत बनी अपराध सिटी , बेलगाम अपराधियों का तांडव

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गुजरात की आर्थिक राजधानी और वैश्विक पहचान रखने वाला ‘डायमंड सिटी’ सूरत इन दिनों एक बेहद गंभीर प्रशासनिक संकट से जूझ रहा है. देश के सबसे सुरक्षित शहरों में गिने जाने वाले सूरत में पिछले छह महीनों के भीतर अपराध का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर गया है, उसने नागरिकों के मन में खौफ पैदा कर दिया है. शहर में लगातार हो रही हत्याओं की वारदातें सीधे तौर पर स्थानीय कानून-व्यवस्था और पुलिस प्रशासन की चौकसी पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं.सूरत में कानून-व्यवस्था की जो हकीकत सामने आ रही है, उसे समझने के लिए आंकड़े ही काफी हैं.सूरत पुलिस कमिश्नर कार्यालय का पक्ष आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती पांच महीनों में ही शहर में 50 हत्या के मामले दर्ज हो चुके थे, हालिया हफ्तों की वारदातों को मिलाकर अन्य मीडिया आउटलेट्स और स्थानीय सूत्रों के अनुसार पिछले छह महीनों का यह खूनी आंकड़ा 63 तक पहुंच चुका है. इसका मतलब यह हुआ कि शहर में औसतन हर तीसरे से चौथे दिन एक व्यक्ति की हत्या की जा रही है.यह स्थिति इसलिए भी हैरान करने वाली है क्योंकि सूरत, गुजरात के गृह राज्य मंत्री श्री हर्ष संघवी का गृह नगर है. वह सूरत की मजूरा विधानसभा सीट से चुनकर आते हैं.अपराधियों में कानून का डर पैदा करने के लिए मंत्री महोदय और सूरत पुलिस की ओर से कई सख्त और अनूठी पहल भी शुरू की गईं.

 

पुलिस ने अपराधियों का मनोबल तोड़ने के लिए सरेआम बीच सड़क पर उनका जुलूस निकाला और परेड ग्राउंड में गुंडों की परेड कराई. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस तरह की प्रतीकात्मक कार्रवाइयों और बड़ी-बड़ी पहलों के बाद भी जमीनी स्तर पर अपराधी बेखौफ क्यों हैं? मर्डर और हिंसक वारदातों का सिलसिला थमने का नाम क्यों नहीं ले रहा है?ऐसा नहीं है कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है. बढ़ते अपराधों पर लगाम लगाने के लिए सूरत पुलिस ने बड़े पैमाने पर ‘ऑपरेशन रेनबो’ अभियान चलाया. इस अभियान के तहत धारदार चाकू, तलवारें और अवैध हथियार रखने वाले लगभग 1,794 समाजकंटकों को गिरफ्तार किया गया. पुलिस की इस मुस्तैदी की सराहना होनी चाहिए, लेकिन जनता का बुनियादी सवाल अपनी जगह कायम है—यदि समय रहते पुलिस की गश्त और इंटेलिजेंस तंत्र मजबूत होता, तो क्या इतनी बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती?अपराधियों का सड़कों पर परेड निकालना सुर्खियां तो बटोर सकता है, लेकिन अपराध रोकने के लिए लोकल इंटेलिजेंस और रात्रिकालीन गश्त का मजबूत होना आवश्यक है. इसकी कमी साफ नजर आ रही है.

 

असामाजिक तत्वों को पकड़कर छोड़ देने या केवल आर्म्स एक्ट के तहत हल्की धाराओं में बंद करने से उनका खौफ खत्म नहीं होता. जब तक अपराधियों में जेल जाने का डर और सख्त न्यायिक सजा का डर नहीं होगा, तब तक वारदातें नहीं रुकेंगी.जब किसी शहर में अपराध अचानक इतना बढ़ जाता है, तो थाना प्रभारियों और उच्च अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए. ढुलमुल रवैया भी अपराधियों का हौसला बढ़ाता हैसूरत जैसे तेजी से बढ़ते औद्योगिक शहर में अगर व्यापारी और आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेंगे, तो इसका सीधा असर शहर की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा. गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी जी को अपनी नई पहलों के साथ-साथ पुलिस महकमे के बुनियादी ढांचे को सुधारने और जवाबदेही तय करने पर कड़ा ध्यान देना होगा. जनता को सड़कों पर अपराधियों के जुलूस से ज्यादा अपनी गलियों और मोहल्लों में सुरक्षित माहौल की उम्मीद है.
संवाददाता :सुमित शुक्ला , गुजरात

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