फतेहपुर। विधानसभा चुनाव-2022 फतह करने के लिए जहां सभी राजनैतिक दलों के शीर्ष नेता क्षेत्र में दिन रात एक किए हुए हैं। वहीं पार्टी की ओर से उतारे गए प्रत्याशी भी अपनी-अपनी जीत सुनिश्चित कराने के लिए कार्यकर्ताओं के साथ विधानसभा के कोने-कोने की खाक छान रहे हैं। 243 खागा सुरक्षित विधानसभा से भाजपा की ओर से तीन बार की विधायक कृष्णा पासवान, समाजवादी पार्टी से रामतीर्थ परमहंस, कांग्रेस से ओम प्रकाश गिहार, बसपा से दशरथ लाल चुनाव मैदान में है। किसी भी विधानसभा में जीत के लिए प्रत्याशियों के पास शीर्ष नेतृत्व के अलावा संगठन व समर्थक सबसे बड़ी ताकत होती है। जिनके बाल पर पार्टी की नीतियों व रीतियों को जन-जन तक पहुंचाकर पार्टी की विचारधारा से जोड़ने व उन्हें वोटर में बदल काटा है। सपा भाजपा समेत सभी दल इन्ही पैटर्न पर कार्य करते रहे हो लेकिन 243 खागा सुरक्षित सीट से सपा प्रत्याशी के पास से संगठन का ढांचा गायब है। सपा ने यहां से पूर्व डीआईजी रामतीर्थ को प्रत्याशी बनाया है। पूर्व पुलिस अधिकारी की कोई राजनैतिक पकड़ न होने की वजह से क्षेत्रीय जनता जहां उनसे डायरेक्ट कनेक्ट होने में नाकाम है वहीं सपा के जानकारों की माने तो प्रत्याशी की ओर से विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को सम्मान न दिए जाने की वजह से कार्यकर्ताओ में रोष है। तरजीह न मिलने से कार्यकर्ता चुनाव कार्य में तो लगें हैं लेकिन पार्टी प्रत्याशी रामतीर्थ के साथ जनसंपर्क करने से कतरा रहे हैं। पार्टी प्रत्याशी पर चंद चाटुकारों से ही घिरे रहने व साधारण कार्यकर्ताओं के साथ बदसलूकी करने का भी आरोप लगाने से पीछे नही हट रहे हैं। विधानसभा चुनाव 2017 में योगी मोदी की लहर के दम पर भाजपा से कृष्णा पासवान ने 94954 वोट हासिल किया था। उनके निकटतम सपा-कांग्रेस गठबंधन प्रत्याशी ओम प्रकाश गिहार मात्र 38520 वोटों पर सिमट गए थे। कृष्णा पासवान ने गिहार को 56434 वोटों से हराकर खागा सुरक्षित सीट पर दूसरी बार कब्ज़ा करते हुए तीन बार विधायक बनकर रिकार्ड कायम किया था।
वहीं 2012 के विधानसभा चुनाव में कृष्णा पासवान ने 59234 वोट पाकर जीत हासिल किया था जबकि बसपा उम्मीदवार मुरलीधर को 40312 वोट मिले थे। खागा सुरक्षित सीट से तीन बार की विधायक कृष्णा पासवान के सामने मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में सपा के पूर्व पुलिस अफसर रामतीर्थ, बसपा के दशरथ लाल व कांग्रेस के ओम प्रकाश गिहार मैदान में है। भाजपा जहां केंद्र व प्रदेश सरकार की योजनाओं व योगी मोदी के चेहरे के दम पर चुनाव मैदान में उतरी है। बसपा जहां अपनी पूर्व सरकार के दौरान किए गए कार्यों का श्रेय लेने में पीछे नहीं है उन्ही कार्यों के दम पर एक बार फिर से मतदाताओं को लुभा रही है। कांग्रेस पार्टी प्रियंका गांधी के संकल्प पत्र और घोषणाओं के बल पर डोरे डालने में जुटी है। वही समाजवादी पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के वादों के दम पर चर्चा में तो है जबकि ज़मीनी हक़ीक़त में प्रचार में भाजपा के पिछड़ती जा रही है। उपेक्षा के चलते कोर कार्यकर्ता सपा प्रमुख के नाम पर एक तो है लेकिन पार्टी प्रत्याशी के प्रचार से दूरी बना रहे हैं। जानकारों की माने तो कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा सपा प्रत्याशी को भारी पड़ सकती है।
