बटला हाउस इन्काउंटर की 17वीं बरसी पर उबाल, राष्ट्रीय ओलमा काउन्सिल ने दोहराई न्यायिक जांच की मांग – “सच सामने आने से डर रही हैं सरकारें”
आज़मगढ़ :- दिल्ली के बटला हाउस में 19 सितम्बर 2008 को हुआ वह एनकाउंटर आज भी सवालों के घेरे में है। इस घटना ने न सिर्फ दो छात्रों आतिफ और साजिद की जान ली बल्कि बहादुर पुलिस अधिकारी मोहन चंद शर्मा की शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया था। सरकार ने इसे आतंकी मुठभेड़ बताया, लेकिन बड़े पैमाने पर इसे फर्जी करार दिया गया। इसी विवाद ने जन्म दिया राष्ट्रीय ओलमा काउन्सिल का, जिसने आज़मगढ़ से लेकर दिल्ली तक सड़कों पर उतरकर आवाज़ बुलंद की और इस इन्काउंटर की जांच की मांग को अपना मुख्य एजेंडा बनाया।
शुक्रवार को बरसी के मौके पर काउन्सिल के कार्यकर्ताओं ने आज़मगढ़ में ज़ोरदार प्रदर्शन किया और प्रधानमंत्री को संबोधित ज्ञापन जिलाधिकारी को सौंपा। प्रदेश अध्यक्ष अनिल सिंह ने कहा कि “यह इन्काउंटर कांग्रेस सरकार की साज़िश था, जिसमें मासूम मुस्लिम नौजवानों को बलि का बकरा बनाया गया। 17 साल बाद भी सच सामने नहीं आने दिया गया। भाजपा हो या कांग्रेस, सबने इस मामले पर चुप्पी साध ली।”
राष्ट्रीय सचिव मोहम्मद नसीम ने कानूनी पहलू उठाते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 176 के तहत किसी भी पुलिस मुठभेड़ में मौत की स्थिति में मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य है, मगर बटला हाउस मामले में इसे दरकिनार कर लोकतंत्र का गला घोंटा गया। “यहां तक कि सत्ता में आने से पहले सवाल उठाने वाले अरविंद केजरीवाल ने भी कुर्सी मिलने के बाद जांच की ज़रूरत नहीं समझी।”
यूथ विंग के प्रदेश अध्यक्ष नुरूलहोदा ने सवाल दागा – “अगर यह एनकाउंटर सही था तो न्यायिक जांच से डर क्यों? जांच होगी तो वही सच सामने आएगा। आखिर सरकारें क्या छुपाना चाहती हैं?”
जिलाध्यक्ष हाजी मतीउल्लाह ने इसे मुसलमानों की अस्मिता से जोड़ते हुए कहा कि आज़ादी के बाद से दंगों, झूठे आतंकी मामलों और मॉब लिंचिंग के ज़रिए मुसलमानों को लगातार निशाना बनाया गया है। “सेकुलर दल हमें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं लेकिन हमारी पीड़ा पर कभी आवाज़ नहीं उठाते।”
बड़ी संख्या में जुटे कार्यकर्ताओं ने एक स्वर में ऐलान किया कि जब तक बटला हाउस इन्काउंटर की न्यायिक जांच नहीं होती, राष्ट्रीय ओलमा काउन्सिल का संघर्ष जारी रहेगा। इस मौके पर हाफिज़ नोमान, मास्टर तारिक अबुल जैश, शकील अहमद समेत अनेक नेता मौजूद रहे।
17 साल बाद भी बटला हाउस की गूंज यह बताने के लिए काफी है कि सवाल अब भी ज़िंदा हैं और शायद सच वही है जिससे सरकारें सबसे ज्यादा डरती हैं।
