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इमाम हुसैन की शहादत ज़ुल्म व जबर के विरुद्ध एक सन्देश है: जावेद भारती

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 आज़मगढ़ :- इस्लामी नया वर्ष 1447 हिजरी शुक्रवार को आरम्भ हुआ और साथ ही मुहर्रम का पवित्र महीना भी शुरू हो गया। मुहर्रम की पहली तारीख जहां इस्लामिक इतिहास में शहादतों की शुरुआत की याद दिलाती है, वहीं दसवीं तारीख यानी ‘आशूरा’ को करबला की वह दर्दनाक घटना सामने आती है जिसने इंसानियत, न्याय और हक़ के लिए जान कुर्बान कर देने का अज़्म पेश किया।

इसी क्रम में प्रसिद्ध लेखक और सामाजिक चिंतक जावेद भारती ने एक बयान में कहा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत केवल इस्लामिक इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि एक वैश्विक संदेश है जो अन्याय, ज़ुल्म और तानाशाही के ख़िलाफ़ सच्चाई और इंसाफ की बुलंद आवाज़ बनकर सामने आती है।

उन्होंने कहा कि मुहर्रम के महीने की शुरुआत ही शहादतों से होती है। पहली तारीख को अज़ीम सहाबी हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु की शहादत हुई, जो एक आतंकवादी हमले का शिकार हुए थे। वहीं दसवीं तारीख को करबला की ज़मीन पर हज़रत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को यज़ीदी हुकूमत ने बर्बरता से शहीद कर दिया।

जावेद भारती ने कहा कि आशूरा का दिन पहले से ही फ़ज़ीलतों वाला था, लेकिन इमाम हुसैन की शहादत ने इसे और अधिक मुक़द्दस बना दिया। आज भी करबला के शहीदों की याद में पूरी दुनिया में मजलिसें, मातम, नय्हा और लंगरों का आयोजन किया जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि इमाम हुसैन की कुर्बानी हम सबके लिए यह सिखाती है कि किसी भी परिस्थिति में अन्याय का साथ नहीं देना चाहिए, भले ही उसके लिए अपनी जान क्यों न देनी पड़े। इमाम हुसैन ने अपने प्राणों की आहुति देकर यह दिखा दिया कि सच्चाई को कभी भी दबाया नहीं जा सकता।

इस अवसर पर जावेद भारती ने समाज से अपील की कि वे मुहर्रम को सिर्फ एक धार्मिक रस्म की तरह नहीं बल्कि एक प्रेरणा के रूप में लें, जिससे हमें अन्याय, ज़ुल्म और झूठ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की ताक़त मिलती है।

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