आज़मगढ़ :- आज यहाँ “साहित्यकार की पक्षधरता” विषय पर एक प्रेरणादायी गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें साहित्यिक चेतना, विचारधारा और समाज में साहित्य की भूमिका पर विस्तृत संवाद हुआ। इस कार्यक्रम का संचालन साहित्य प्रेमी और संयोजक श्री सत्यम प्रजापति ने किया।
गोष्ठी के प्रारंभ में वक्ताओं ने साहित्य में पक्षधरता की अवधारणा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि एक साहित्यकार केवल कल्पना में जीने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज का सजग प्रहरी होता है, जो अपने लेखन से समय की नब्ज़ को पकड़ता है और जन-जन की पीड़ा को स्वर देता है। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि साहित्यकारों को समय के ज्वलंत मुद्दों से विमुख नहीं होना चाहिए, बल्कि उनकी लेखनी में स्पष्ट वैचारिक पक्षधरता होनी चाहिए।
वरिष्ठ वक्ताओं ने कहा कि आज के दौर में जब चारों ओर संवेदनहीनता और विभाजन की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं, तब साहित्य को और अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की आवश्यकता है। उन्होंने रेखांकित किया कि लेखन में तटस्थता अक्सर अन्याय के पक्ष में खड़े हो जाने जैसा हो जाता है। इसलिए, साहित्यकारों की वैचारिक प्रतिबद्धता ही उसे समाज में सार्थक बनाती है।
गोष्ठी के रचनात्मक सत्र में देश के सुप्रसिद्ध कवि बैजनाथ गंवार ने अपनी भावपूर्ण कविताओं से उपस्थित साहित्य प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी कविताओं में ग्राम्य जीवन की सरलता, करुणा और सामाजिक यथार्थ की झलक दिखाई दी। वहीं चर्चित कवि मयकश आजमी ने अपनी रचना “पागल” का सशक्त पाठ किया, जिसमें उन्होंने मानसिक संवेदनाओं की गहराइयों को प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया। श्रोताओं ने उनकी प्रस्तुति को खूब सराहा।
इसके अतिरिक्त राजकुमार आशीर्वाद और घनश्याम यादव ने अपनी मधुर और अर्थपूर्ण कविताओं से माहौल को भावनात्मक और प्रेरक बना दिया। उनकी रचनाओं में सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों की स्पष्ट छवि दिखाई दी।
कार्यक्रम में कई साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति रही, जिनमें टाइपिस्ट आशीष दूबे, ज्ञानेन्द्र प्रजापति और कर्मवीर यादव उल्लेखनीय रहे। उन्होंने गोष्ठी को समयानुकूल और अत्यंत सार्थक बताते हुए ऐसे आयोजनों की निरंतरता की आवश्यकता पर बल दिया।
अंततः, यह गोष्ठी साहित्यिक विचार-विमर्श की एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध हुई, जिसने यह संदेश दिया कि साहित्य केवल सौंदर्यबोध का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है।
