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शैक्षिक जागरूकता की नई लहर: मंजीर पट्टी में मदरसा नासिर-उल-उलूम का भव्य सम्मेलन

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आजमगढ़ :-  मंजीर पट्टी में स्थित मदरसा नासिर-उल-उलूम में एक भव्य शैक्षिक जागरूकता सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. मिर्जा महमूद बेग ने विशेष अतिथि के रूप में भाग लिया। अपने संबोधन में उन्होंने मंजीर पट्टी के निवासियों को इस महत्वपूर्ण एवं सफल कार्यक्रम के लिए बधाई दी।
उन्होंने इक़रा (اقرأ ) की आयत के संदर्भ में शिक्षा के महत्व पर प्रतिबिंबित किया और बताया कि जब यह आयत उतरी तो इसने पूरे समाज में एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। उन्होंने कहा कि आज विश्व में अग्रणी राष्ट्र वे हैं जिन्होंने सुदृढ़ योजना के साथ शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया है। हमें अपने देश के युवाओं के बारे में बहुत चिंतित होना चाहिए, यदि हम अभी से इस पहलू पर विचार नहीं करेंगे तो आने वाली पीढ़ियां उज्ज्वल भविष्य का आनंद नहीं ले पाएंगी।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. फिरोज़ तलत अलीग़ ने अपने अध्यक्षीय भाषण में स्कूली बच्चों से आत्मीयता से बात की तथा अपने अनुभवों के आधार पर इस बात पर ज़ोर दिया कि स्कूल और मदरसा व्यवस्था को समय के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने सर सैय्यद के शैक्षिक आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि सर सैय्यद ने शिक्षा के साथ-साथ छात्रों के प्रशिक्षण पर भी बहुत ज़ोर दिया, जिसने राष्ट्र के निर्माण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजमगढ़ के शैक्षिक परिदृश्य का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि स्थिति चिंताजनक जरूर है, लेकिन निराशाजनक नहीं है। उन्होंने शैक्षिक जागरूकता अभियान में उच्च शिक्षित युवाओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी की सराहना की और इसे एक नई शैक्षिक क्रांति की शुरुआत बताया। उन्होंने देश के साहसी और उत्साही युवाओं से युवा राष्ट्र की शिक्षा और विकास के लिए मज़बूत नेतृत्व प्रदान करने का आह्वान किया।

प्रसिद्ध शैक्षिक एवं सामाजिक कार्यकर्ता तथा आजमगढ़ स्कूल पुनरुद्धार संगठन के सदस्य श्री कलीम जामयी ने अपने संबोधन में स्कूलों और मदरसों के उज्ज्वल इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में इन मदरसों से पढ़े लोगों ने हमेशा ही सरकार में उच्च पदों पर प्रमुख भूमिका निभाई है। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से लेकर ए- पी- जे अब्दुल कलाम तक, मदरसों की महानता और वैभव का वर्णन करने वाली एक लंबी पंक्ति है। उन्होंने आजमगढ़ स्कूल पुनरुद्धार संगठन के नित्य आसपास के क्षेत्र में लगभग बारह विद्यालयों को सक्रियता एवं गतिशीलता से चलाने के लिए जिम्मेदार संगठन को बधाई दी। उन्होंने कहा की गांव के स्कूलों को गुणवत्तापूर्ण पब्लिक स्कूलों के बराबर चलाने के लिए एक नई प्रतिबद्धता और उत्साहपूर्ण योजना बनाई गई है, जिसमें आपका सहयोग अपरिहार्य है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सादात सुहेल इस्लाही ने अभिभावकों और शिक्षकों से अपने बच्चों की शिक्षा और प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि बच्चे की पहली पाठशाला उसकी मां की गोद होती है। माता-पिता को अपने बच्चों के प्रति ईमानदार होना चाहिए और उनकी बातें ध्यान से सुननी चाहिए, उनके प्रश्नों और चिंताओं का संतोषजनक उत्तर दिया जाना चाहिए, इस व्यवहार से बच्चा अपने माता-पिता का घनिष्ठ मित्र बन जाता है। शिक्षकों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षक हर स्तर पर विद्यार्थियों के लिए आदर्श होते हैं, इसलिए इस भविष्यसूचक मिशन को चुनते समय शिक्षक को यह ध्यान रखना चाहिए कि उसका नैतिक चरित्र और योग्यता उच्च होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कुम्हार मुलायम मिट्टी से सुन्दर बर्तन बनाते हैं, उसी प्रकार माता-पिता, शिक्षक और पर्यावरण बच्चों के मानसिक और बौद्धिक प्रशिक्षण के माध्यम से राष्ट्र के लिए एक बहुमूल्य संपत्ति बना सकते हैं।

राजकीय हाईस्कूल आजमगढ़ के शिक्षक डॉ. मुहम्मद अजमल ने शैक्षिक जागरूकता अभियान के लिए जिम्मेदार लोगों को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि इस विद्यालय का यह ऐतिहासिक कार्यक्रम एक नए अध्याय की शुरुआत होगी। यदि इस विद्यालय पर ईमानदारी, समर्पण, त्याग और उचित दिशा-निर्देशों के साथ ध्यान केन्द्रित किया जाए तो इसके परिणाम बहुत प्रभावी और फलदायी होंगे। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में पहले से अधिक समझदारी और जिम्मेदारी से काम करने की आवश्यकता वर्तमान परिस्थितियों में नहीं समझी गई है और यदि इस पीड़ा को नहीं समझा गया तो हमारा भविष्य कष्ट और कठिनाइयों से भरा होगा।
इस कार्यक्रम में स्कूल के विद्यार्थियों ने शानदार भाषण और नात रसूल पेश किए।

कार्यक्रम का संचालन रजब अली शेरवानी ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन समीउल्लाह इस्लाही ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत हाफिज अख्तर द्वारा कुरान की तिलावत से हुई। इस अवसर पर मदरसे के सभी अध्यापकगण, मदरसा प्रधानाचार्य शमीम अहमद, नसीम अहमद, मुहम्मद आसिम इस्लाही, अब्दुल्लाह आज़मी, मुहम्मद ताबिश आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे।

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