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न्यायालय के आदेश के बाद भी दोषी अफसरों पर नहीं हुई कार्रवाई, न्याय पाने को दुधमुंहे बच्चे के संग दर-दर भटक रही बिन ब्याही मां

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पुलिस विभाग के अफसरों ने न्यायालय के आदेश को दिखाया ठेंगा, अपने ही अफसरों पर कार्रवाई करने से कतरा रही ख़ाकी
फ़तेहपुर। गांव के ही परिचित युवक द्वारा नाबालिग के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम देने के मामले में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अफसरों पर अदालत ने गंभीर आरोप लगाते हुए भले ही कार्रवाई के निर्देश दिए हो लेकिन उस के बाद भी पुलिस विभाग के अफसर अपने ही कर्मियों को बचाने में जुटे हैं। अदालत के आदेश को दरकिनार कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। दोषियों पर कार्रवाई की मांग को लेकर दुष्कर्म पीड़िता आज भी अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ दर दर भटकने को मजबूर है।
बतातें चले कि एक गांव निवासी नाबालिग किशोरी के साथ गांव के ही सरसिज मोहन उर्फ राजू सचान द्वारा बार बार दुष्कर्म करने पश्चात उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी गयी थी किशोरी की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज करते हुए अभियुक्त सरसिज मोहन उर्फ राजू सचान को न्यायालय भेज दिया जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया। अदालत में वाद की सुनवाई की 90 दिन की अवधि बीत जाने के बाद विवेचक तत्कालीन थानाध्यक्ष खखरेरू दीप नारायण द्वारा आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया। इसी बीच अभियुक्त सरसिज मोहन उर्फ राजू सचान द्वारा अदालत से 91 दिन बीत जाने के बाद पुलिस द्वारा आरोप दाखिल न होने की वजह से ज़मानत दिए जाने के लिए प्रार्थना पत्र दाखिल करते हुए ज़मानत देने की मांग किया। अदालत ने पीड़िता को नाबालिग 16 वर्षीय मानने के अलावा पीड़िता का प्रसव व बच्चे के जन्म को भी माना। अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, पॉक्सो एक्ट फतेहपुर ने विवेचक दीपनारायण व उनकी रिपोर्ट को अग्रसरित करने वाले क्षत्राधिकारी बिंदकी पर विवेचना में गंभीर लापरवाही बरतने एव विधि कर्तव्यों का सम्यक निर्वहन न किये जाने के कारण उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई के लिए डीजीपी को पत्र भेजने का निर्देश पारित किया। विद्वान न्यायाधीश ने आरोप पत्र को दाखिल करने में देरी करने पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अभियुक्त के विरुद्ध पर्याप्त सबूत होने के बाद भी विवेचक द्वारा समय सीमा के अंदर आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल न करके अभियुक्त को अनुचित लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। ताकि 90 दिन की समय सीमा के बाद अभियुक्त अन्तर्गत धारा 167 (2) सीआरपीसी ने जमानत ओर रिहा हो सके। पीड़िता के 161 व 164 के अपने बयान में अभियुक्त सरसिज मोहन उर्फ राजू सचान पर दुष्कर्म के आरोप को सही माना साथ ही कहा कि विवेचक द्वारा डीएनए जांच का हवाला देते हुए न्यायालय में आरोप पत्र प्रषित करने से नहीं रोका जा सकता। पर्याप्त समय होने के बाद भी पुलिस अफसरों के आरोप पत्र दाखिल करने में देरी करने व समयावधि पूरी होने के बाद भी रिमांड की मांग न किये जाने पर अभियुक्त को तो ज़मानत दे दी लेकिन पुलिस की कार्यशैली को घोर लापरवाही मानते हुए विभागीय कार्रवाई के लिए डीजीपी को पत्र भेजने की बात कही। अदालत के आदेश के बाद भी दोषी पुलिस अधिकारी पद पर आसीन है। दूसरी ओर पीड़िता बिन ब्याही मां बनने के बाद नाबालिग अपने दुधमुहे बच्चे के साथ अब भी न्याय की आस में कभी किसी अफसर की चौखट पर तो कभी किसी अफसर की चौखट पर दस्तक देने को मजबूर है।

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