रामघाट रोड पर रुकी ‘युवा जोड़ो पदयात्रा’, सोशल मीडिया पर मचा समर्थन का शोर
अलीगढ़ – के रामघाट रोड पर सोमवार को ‘युवा जोड़ो पदयात्रा’ को पुलिस द्वारा अचानक रोक दिए जाने के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई है। यह पदयात्रा मथुरा के पवित्र वृंदावन धाम से शुरू होकर उत्तर प्रदेश के संभल जिले तक जानी थी, लेकिन पुलिस ने क्वार्सी थाना क्षेत्र में इसे बीच रास्ते ही रोक दिया। इसके पीछे प्रशासन ने “अनुमति की कमी” और “कानून व्यवस्था की संभावित गड़बड़ी” का हवाला दिया है।
यात्रा की अगुवाई कर रहीं हर्षा रिछारिया ने इस कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण और अनुचित करार दिया। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कहा, “हमारी यात्रा पूरी तरह अहिंसक और गैर-राजनीतिक थी। हमारा उद्देश्य केवल युवाओं को सनातन मूल्यों और भारतीय संस्कृति से जोड़ना था। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी आवाज को रोकने का प्रयास किया गया।”
क्या थी ‘युवा जोड़ो पदयात्रा’?
हर्षा रिछारिया द्वारा शुरू की गई यह पदयात्रा ‘युवा जोड़ो आंदोलन’ का हिस्सा थी, जिसका मुख्य उद्देश्य युवाओं में सनातन संस्कृति, गौ-संरक्षण, नारी सशक्तिकरण और राष्ट्रप्रेम जैसे विषयों के प्रति जागरूकता बढ़ाना था। यात्रा को विभिन्न धार्मिक स्थलों और गांवों से होकर गुजरना था, जहां युवाओं से संवाद स्थापित कर उन्हें भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की योजना थी।
प्रशासन का पक्ष
अलीगढ़ पुलिस के अनुसार, इस यात्रा के लिए किसी प्रकार की प्रशासनिक अनुमति नहीं ली गई थी। बड़े जनसमूह की सार्वजनिक जगहों पर आवाजाही से यातायात व्यवस्था बाधित हो सकती थी और स्थानीय शांति-व्यवस्था पर भी असर पड़ सकता था। पुलिस ने यह भी कहा कि बिना अनुमति कोई भी सार्वजनिक आयोजन कानून का उल्लंघन माना जाता है, चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक।
सोशल मीडिया पर समर्थन की बाढ़
जैसे ही यात्रा को रोके जाने की खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर हर्षा रिछारिया के समर्थन में प्रतिक्रिया की बाढ़ आ गई। ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर #HarshaRichharia, #YuvaJodoPadyatra और #LetTheYatraGo जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे। हजारों लोगों ने इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी और धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट बताया।
कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने लिखा, “जब राजनीतिक रैलियों के लिए अनुमति रातों-रात मिल जाती है, तो एक शांतिपूर्ण धार्मिक यात्रा को क्यों रोका गया?” वहीं कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रशासन की पक्षपातपूर्ण नीति का उदाहरण है?
हर्षा रिछारिया का अगला कदम
हालांकि यात्रा को फिलहाल रोक दिया गया है, लेकिन हर्षा रिछारिया ने साफ किया है कि उनका अभियान यहीं खत्म नहीं होगा। उन्होंने कहा, “हम कानूनी मार्ग अपनाएंगे। हमारा आंदोलन किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश का जागरण है।”
उन्होंने यह भी घोषणा की कि जल्द ही लखनऊ में एक प्रेस वार्ता आयोजित की जाएगी, जिसमें प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ जनमत तैयार करने की योजना साझा की जाएगी। साथ ही, उन्होंने अपने समर्थकों से अपील की कि वे शांतिपूर्ण ढंग से अपने विचार व्यक्त करें और यात्रा के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में सहयोग करें।
बड़ा सवाल: धार्मिक स्वतंत्रता बनाम प्रशासनिक नियम
यह घटना एक बार फिर इस सवाल को जन्म देती है कि धार्मिक और सामाजिक अभियानों के लिए अनुमति की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और संतुलित है। जब संविधान हर नागरिक को अपने धर्म के प्रचार और अभ्यास की स्वतंत्रता देता है, तब प्रशासनिक अड़चनें किस हद तक स्वीकार्य हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि धार्मिक अभियानों और सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल के बीच एक संतुलन बनाए रखना जरूरी है। लेकिन जब किसी आयोजन का उद्देश्य स्पष्ट रूप से गैर-राजनीतिक और सांस्कृतिक हो, तो प्रशासन को संवाद और सहयोग की नीति अपनानी चाहिए।
‘युवा जोड़ो पदयात्रा’ का रोका जाना सिर्फ एक आयोजन को थामने की बात नहीं है, बल्कि यह उस विमर्श का हिस्सा बन गया है जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता, युवाओं की भागीदारी और प्रशासनिक संवेदनशीलता जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। हर्षा रिछारिया और उनके समर्थकों की यह पदयात्रा भले ही फिलहाल थम गई हो, लेकिन इससे उपजी बहस आने वाले समय में और गहराने वाली है।
