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चार दिनों तक भुखें प्यासें भटकते रहे श्रद्धालु नहीं दिखें समाजसेवी

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रिपोर्ट – राजेश चतुर्वेदी, प्रयागराज

महाकुंभ मेले में श्रद्धालुओं को भारी परेशानियां, समाजसेवियों की गैरमौजूदगी पर सवाल

प्रयागराज, गौहनिया: मौनी अमावस्या पर्व पर प्रयागराज के गौहनिया क्षेत्र में आयोजित महाकुंभ मेले में लाखों श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। संगम पर स्नान करने के लिए देशभर से आए श्रद्धालुओं ने पूरे क्षेत्र में आवागमन को बाधित कर दिया। यमुना नगर के पुराने पुल से लेकर डांडी, चाका, मामा भांजा तालाब, घूरपुर, करमा, गौहनिया, और बांदा रोड तक के इलाकों में भारी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ देखी गई। लेकिन, इस भारी भीड़ के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु चार दिनों तक भूखे-प्यासे भटकते रहे।

श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं की भारी कमी

महाकुंभ जैसे विशाल आयोजन के दौरान व्यवस्थाओं की कमी स्पष्ट रूप से उजागर हुई। श्रद्धालुओं को न केवल भोजन और पानी के लिए तरसना पड़ा, बल्कि कई लोग अपने गंतव्य तक पहुंचने में भी असमर्थ रहे। यमुना नगर के आस-पास के इलाकों में फंसे श्रद्धालुओं को मदद की दरकार थी, लेकिन सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों की ओर से कोई ठोस सहायता नहीं पहुंचाई गई।

स्थानीय निवासियों का अनुकरणीय प्रयास

इस कठिन परिस्थिति में यमुना नगर और आसपास के क्षेत्रों के स्थानीय निवासियों ने आगे आकर मदद का हाथ बढ़ाया। उन्होंने अपने घरों से श्रद्धालुओं के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था की। स्थानीय लोगों ने अपनी सीमित क्षमताओं में भी पूरी कोशिश की कि किसी को भूखा न रहना पड़े।

इन निवासियों का यह प्रयास काबिल-ए-तारीफ है, जिन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के श्रद्धालुओं को राहत प्रदान की। उनकी इस पहल ने न केवल इंसानियत का परिचय दिया, बल्कि महाकुंभ मेले में मौजूद प्रशासनिक अव्यवस्थाओं को भी उजागर किया।

सोशल मीडिया और अखबारों में सक्रिय समाजसेवी गायब

वहीं, महाकुंभ मेले के दौरान एक और मुद्दा उभर कर सामने आया। जो समाजसेवी सोशल मीडिया और अखबारों में अपने कार्यों का प्रचार-प्रसार करते हैं, वे ऐसे कठिन समय में कहीं नजर नहीं आए। स्थानीय निवासियों और पत्रकारों ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि ये तथाकथित समाजसेवी केवल नाम और प्रसिद्धि के लिए अपने कार्यों का प्रचार करते हैं, लेकिन जब असल में सेवा करने का समय आता है, तो वे गायब हो जाते हैं।

पत्रकारों ने इस विषय को गंभीरता से उठाते हुए कहा कि जो समाजसेवी मुश्किल घड़ी में आगे नहीं आते, उनकी खबरों को आगे बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है।

पत्रकारों की बैठक में हुई चर्चा

क्राइम इंफॉर्मेशन ब्यूरो ऑफ इंडिया के कार्यालय में आयोजित पत्रकारों की बैठक में महाकुंभ मेले में हुई घटनाओं पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया। पत्रकारों ने इस बात पर सहमति जताई कि भविष्य में वे केवल उन्हीं समाजसेवियों की खबरों को प्रकाशित करेंगे, जो वास्तव में समाज सेवा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। बैठक में ऋषभ द्विवेदी, राजेश चतुर्वेदी, परवेज आलम, मोहम्मद आरिफ, मोहम्मद सलीम, पुष्पराज सिंह, राकेश पटेल, अशोक यादव, राजेश कुमार और महमूद अली सहित कई अन्य पत्रकार मौजूद थे।

पत्रकारों ने यह भी कहा कि महाकुंभ जैसे आयोजनों में प्रशासनिक तैयारियों की कमी को उजागर करना मीडिया का कर्तव्य है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।

महाकुंभ में हुई अव्यवस्था पर सवाल

महाकुंभ मेले में हुई अव्यवस्थाओं ने न केवल प्रशासनिक खामियों को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखाया कि इतने बड़े आयोजन के लिए किस स्तर की तैयारी की आवश्यकता होती है। लाखों श्रद्धालुओं के आगमन के बावजूद भोजन, पानी और परिवहन जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने प्रशासन की योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

इसके अलावा, महाकुंभ मेले में आपातकालीन सेवाओं का भी अभाव देखा गया। भारी भीड़ के कारण कई लोग अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच सके और उन्हें खुले आसमान के नीचे रात बितानी पड़ी। कई जगहों पर चिकित्सा सुविधाओं की कमी भी सामने आई, जिससे बीमार और वृद्ध श्रद्धालुओं को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

स्थानीय प्रशासन की प्रतिक्रिया

स्थानीय प्रशासन ने मेले की अव्यवस्थाओं पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आगमन की उम्मीद नहीं थी। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि व्यवस्थाओं में सुधार की जरूरत है और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।

प्रशासन ने स्थानीय निवासियों के प्रयासों की सराहना की और कहा कि उनका योगदान प्रशंसनीय है। लेकिन सवाल यह है कि जब प्रशासन को मेले के दौरान संभावित समस्याओं की जानकारी थी, तो उन्होंने पहले से क्यों पर्याप्त इंतजाम नहीं किए?

समाजसेवियों के लिए सबक

इस घटना ने समाजसेवियों के लिए भी एक बड़ा संदेश दिया है। समाज सेवा केवल प्रचार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी है। जब लाखों लोग परेशानियों का सामना कर रहे हों, तो यह समाजसेवियों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे आगे आकर मदद करें।

 

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