दोस्तों, आज की कहानी आपके दिल को हिला कर रख देगी……यह कहानी सिर्फ एक माँ के अपमान की नहीं है…
यह कहानी है उस समाज की, जो दिन में माता-पिता को भगवान कहता है…..और रात को उन्हें बोझ समझकर घर से निकाल देता है।
आज हम बात करेंगे 65 साल की शोभा देवी की और उनके पति भुआल गुप्ता की… कैंपियरगंज, गोरखपुर के रहने वाले इस दंपती को उनके ही बेटों ने घर से निकाल दिया था……और जब मां की मौत हुई… तो बेटा बोला—
“घर में शादी है, लाश मत भेजना… अपशगुन हो जाएगा…..फ्रीजर में रखवा दो, शादी के बाद अंतिम संस्कार कर देंगे।”
सोचिए…जिस मां ने पूरी जिंदगी बच्चों के लिए खून-पसीना बहाया….आज उसकी लाश तक घर के दरवाज़े पर नहीं आ सकती!
चलिए, मैं आपको पूरी कहानी बताता हूँ ….
भुआल गुप्ता …जो एक किराना व्यापारी थे ….उनकी पत्नी—का नाम शोभा देवी था ….उनके तीन बेटे, तीन बेटियां… थीं ..जिनको पालने पोसने …पढ़ाने लिखाने में भुआल गुप्ता ने कोई कमी नहीं की थी …..उम्र होने पर सबकी शादियाँ भी कर दीं…..
पूरा घर खुशहाल था… भुआल गुप्ता और शोभा देवी अब दादा-दादी बन चुके थे….लेकिन तभी एक दिन दोनों पर उस वक़्त मुसीबत टूट पड़ती है ..जब बूढ़े हो चुके माँ – बाप को बड़े बेटे ने कहाकि …..
“तुम लोग घर पर बोझ बन गए हो….. निकल जाओ हमारे घर से ….जरा सोचकर देखिये …..उस वक़्त मां – बाप के दिल पर क्या गुज़री होगी ….अपमान और तिरस्कार सहकर उस घर में रहना मुश्किल हो गया था …क्योंकि काफी मिन्नतें करने के बाद भी बेटे मां – बाप को अपने साथ रखने के लिए राज़ी न थे …
कोई सूरत बनती न देख दोनों बुजुर्ग दंपत्ति घर छोड़ देते हैं …रास्ते भर दोनों एक दूसरे से बाट करते रहे कि अब जीने की कोई उम्मीद नहीं बची है है …और दोनों चलते – चलते राजघाट पहुँच गए ….दोनों ने सोचा अब आत्महत्या करके इस संसार को अलविदा कह दें …तभी एक राहगीर उन दोनों के इरादों को भांप गया …और उन्हें रोक दिया ….उसने कहा अरे ऐसे ज़िन्दगी से निराश मत हो ….अयोध्या या मथुरा चले जाओ….वहां आश्रय मिल जाएगा…..रहने और खाने -पीने की कोई दिक्कत नहीं होगी …
भुआल गुप्ता और शोभा देवी पहले अयोध्या गए ….लेकिन वहां बात नहीं बनी …फिर वहां से मथुरा भी गए …वहां भी बाट नहीं बनी ….लेकिन मथुरा में उन्हें एक उम्मीद ज़रूर मिली …..वहां उन्हें जौनपुर के एक वृद्धाश्रम का नंबर मिलता है ….उस नंबर पर फोन होता है तो वृद्धाश्रम संचालक रवि चौबे ने उन्हें जौनपुर बुला लेता है …..और यहीं उनका सहारा बन गया….यहाँ दोनों को रहने और खाने की चिंता नहीं थी …
सब कुछ ठीक चल रहा था …लेकिन अचानक एक दिन वृद्धाश्रम में शोभा देवी को लकवा मार गया……वह चलने – फिरने में लाचार हो गयी ….उनका इलाज हुआ ….दवाइयाँ चलीं…जांच हुई तो पता चला कि…. किडनी फेल हो चुकी थीं…..19 नवंबर की रात हालत बिगड़ गई……और रात में ही उनकी मौत हो गई…..इसके बाद शुरू होती है वो त्रासदी …जिसका अंदाजा अगर भुआल गुप्ता को पहले होता तो कभी भी भगवान् से औलाद नहीं माँगते …बल्कि नि:संतान ही ज़िन्दगी बिता देते ….शोभा देवी की मौत हो जाने के बाद
वृद्धाश्रम संचालक रवि चौबे छोटे बेटे को कॉल करते हैं ..और बताते हैं ककि “आपकी मां का देहांत हो गया है….
उनका अंतिम संस्कार करना है…..उनकी इच्छा थी कि उनका दाह संस्कार गोरखपुर में कराया जाए ….इस बात को सुनकर छोटा बेटा कहता है कि “घर में भइया के बेटे की शादी है… बात करके बताता हूं….भुआल गुप्ता और रवि चौबे उसके फ़ोन का इंतज़ार करते हैं …10 मिनट बाद फ़ोन वापस आता है ….छोटा बेटा कहता है कि “भइया बोले हैं कि शव को फ्रीजर में रखवा दो….शादी खत्म हो जाए तो अंतिम संस्कार कर देंगे…..
ये शब्द सुनकर…पत्नी की मौत से टूट चुके बुजुर्ग का दिल भी टूट गया……भुआल गुप्ता कहते हैं कि अब गोरखपुर नहीं जाएंगे…और जोर जोर से रोने लगते हैं …और सिसकते हुए कहते हैं कि ….मैं पत्नी को फ्रीजर में कैसे रख दूं……अब जौनपुर में अंतिम संस्कार करूंगा….
लेकिन तभी बेटियों का फोन आता है ……कि “पापा, मां को गांव ले आइए….इसपर लाचार पिता मान जाते हैं ….किसी तरह से एम्बुलेंस से जब पत्नी का शव लेकर वे गांव पहुंचे तो …. बड़े बेटे ने साफ़ मना कर दिया—कि मां की लाश को घर पर मत लाना ….हद तो तब हो गयी जब …रिश्तेदारों ने भी शव को घर आने तक नहीं दिया….गांव के लोगों ने दबाव बनाकर घाट के पास गैर हिन्दू रीति – रिवाज के ही मिट्टी में लाश को दफना दिया….ये कैसा अंतिम संस्कार था …जहाँ शव का सम्मान नहीं…..धधकती चिता भी नहीं…बस मिट्टी में दफना दिया गया..
.ये सब देखकर भुआल गुप्ता बस रोये जा रहे थे ….उनको कहा गया कि 4 दिन बाद इस मिटटी से शव निकाल कर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा …..भुआल गुप्ता ने रोते हुए कहाकि ..अरे “चार दिन में शव को कीड़े खा जाएंगे…..मैं कितना बदनसीब हूँ कि अपनी पत्नी का मैं अंतिम संस्कार भी नहीं कर पाया…उनकी तकलीफ उस वक़्त और बढ़ गयी जब ….पंडित को बुलाकर उनसे पूछा गया की क्या शव को 4 दिन बाद निकालकर उसका अंतिम संस्कार किया जा सकता है ….तो उन्होंने साफ कहा—कि “दफनायी हुई लाश दोबारा निकालकर अंतिम संस्कार नहीं किया जा सकता…
पंडित ने कहा—कि “अब आटे का पुतला बनाइए… और उसका संस्कार कीजिए….सोचिए… जिस मां ने जीवनभर बच्चों को खिलाया…..आज उसकी जगह आटे का पुतला जलेगा।
जौनपुर में वृद्धाश्रम चला रहे रवि चौबे बताते हैं—कि इस तरह की स्थिति उनके जीवन में कभी भी नहीं आई …अपना ही खून इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ….रवि बताते हैं कि भुआल गुप्ता का बड़ा बेटा किराना दुकान और मेडिकल स्टोर दोनों चलाता है….उसका आलीशान मकान है….और आर्थिक रूप से संपन्न भी है…..लेकिन मां – बाप से कभी बात नहीं करता था …छोटा बेटा कभी-कभी कॉल करता था…लेकिन माँ का शव लेने तक नहीं आया…..इस दर्दनाक कहानी का यही अंत नहीं है ….क्योंकि आज भी बहुत से वृद्धआश्रम में कोई भुआल गुप्ता ..और शोभा देवी ..ये सवाल इंसानियत से पूछ रहे हैं कि ..आखिर हमारी गलती क्या थी …..वहीँ अलग अलग मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से ये भी बताया गया कि दरअसल शोभा देवी समूह से रुपये ली थी …जो बढ़ाते – बढ़ाते इतना बढ़ गए कि चुकाना मुश्किल हो गया …जिस वजह से उन्हें अपना घर बार छोड़ना पड़ा ..और घर से निकालने वाली बाट लोगों की सिम्पथी हासिल करने के लिए बतायी गयी …और बड़े बेटे के घर पर शादी थी ..इस वजह से उन्हें लगा कि शव को फ्रीजर में रखवा देंगे और बाद में अंतिम संस्कार करवा देंगे …खैर वजह जो भी रही हो ..इस घटना ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है …जिस मां – बाप ने अपने 6 -6 बच्चों को पाल लिया …उस माँ – बाप को उनके बच्चों ने ही बेसहारा छोड़ दिया …
दोस्तों, यह कहानी सिर्फ एक मां के अपमान की नहीं है—यह कहानी है हमारी सोच की विफलता की…….
अब हमें खुद से सवाल पूछने का वक़्त आ गया है ….क्या हमारी संस्कृति अब सिर्फ भाषणों में रह गई है?………क्या मां-बाप का सम्मान सिर्फ फेसबुक पोस्ट तक सीमित है?
क्या इतना गिर चुके हैं हम कि शादी में “अपशगुन” न हो इसलिए…..अपनी मां की लाश ही नहीं लेते?…..वृद्धाश्रम क्यों बढ़ रहे हैं?……क्यों बूढ़े माता-पिता भटक रहे हैं?…..क्यों बेटों के दिलों में इतनी नफ़रत है?….ये सवाल आप सबसे है ….और अगर आपके पास इसका कोई जवाब हो तो हमें कमेन्ट करके ज़रूर बताइयेगा ….अपने माता -पिता का ख्याल रखियेगा …
