राष्ट्रभक्ति की नयी राजनीति में मुसलमान : शंका बनाम पहचान
बीते दशकों के अंतराल भारत में सामाजिक और राजनीतिक वातावरण इस तरह बदला है कि मुसलमान होना कई बार अपने आप में एक ‘संदेह’ का पर्याय बनता जा रहा है। संविधान भले कहता हो कि धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग कहानी कहती है। जिन देश-प्रदेशों में सामाजिक सौहार्द कभी सांस्कृतिक पहचान हुआ करता था, वहाँ अब एक धार्मिक समुदाय पर अविश्वास और पूर्वाग्रह का बोझ डाला जाने लगा है। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं है, बल्कि वैश्विक और घरेलू दोनों ही राजनीतिक प्रक्रियाओं का संयुक्त परिणाम है।
दुनिया में 9/11 के बाद जिस तरह आतंकवाद का चेहरा ‘मुसलमान’ के रूप में गढ़ा गया, उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक स्थायी दुष्प्रचार को जन्म दिया, जिसकी कोई न तो वैचारिकी रही न ठोस आधार। हॉलीवुड फिल्मों से लेकर पश्चिमी टीवी न्यूज और राजनीतिक मंचों तक, आतंकवाद की हर छवि एक ऐसी तस्वीर पर जाकर टिकती थी, जिसमें आरोपी की दाढ़ी, नाम या कपड़ा उसे ‘मुस्लिम खतरा’ की श्रेणी में रख देता था। इस दुष्प्रचार की शुरूआत सर्वप्रथम अमरीकी राजनीति को पोषने के लिए किया गया जहां उसे आतंकवाद जैसे समस्याओं को खड़ा करना था फिर उसे खत्म करने के लिए हथियारों का विक्रय करना था, किन्तु यह सिर्फ अमरीका या यूरोप तक सीमित नहीं रहा। भारत जैसे देश में भी इस छवि को स्थानीय राजनीतिक लाभों के अनुसार ढाल लिया गया। यहाँ भी आतंक का अर्थ मुस्लिम और संदेह का पहला निशाना दाढ़ी और टोपी बना दिया गया। इस वातावरण ने पुलिस, प्रशासन, समाज और मीडिया के दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया। यही कारण है कि पिछले दो दशकों में, विशेषकर 2014 के बाद, देश भर में अनेक मुस्लिम युवकों को आतंकवाद या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के नाम पर गिरफ्तार किया गया जिनमें से अधिकांश बाद में निर्दोष पाए गए। गुजरात में सन् 2001 में गिरफ्तार किए गए 127 मुस्लिम विद्वानों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को अदालत ने 2021 में यह कहकर बरी किया कि उनके विरुद्ध एक भी ठोस सबूत नहीं मिला। कोई सोच सकता है कि 19 साल बाद आई इस निर्दोषता की घोषणा का क्या महत्व? पाँच आरोपी मुकदमा लड़ते-लड़ते दुनिया से चले गए, अनेक परिवार बिखर गए, नौकरियाँ चली गईं और जो बचे, वे मानसिक और सामाजिक रूप से तबाह हो चुके थे। इसी तरह महाराष्ट्र के भुसावल में 1994 में गिरफ्तार 11 मुस्लिम व्यक्तियों को 25 वर्ष बाद अदालत ने झूठे आरोपों से मुक्त किया। इन लोगों ने अपनी जवानी और जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष जेलों में गँवा दिए।
2006 के मालेगांव धमाकों में पकड़े गए नौ मुस्लिम युवकों की कहानी भी कुछ अलग नहीं, जहां पुलिस ने उन्हें थर्ड डिग्री टाॅर्चर, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देकर झूठे इकबालिया बयान करवाए। वर्षों बाद जब NIA ने जांच की, तो पाया गया कि इनका घटनाओं से कोई संबंध नहीं था, लेकिन इन युवकों के जीवन पर जो स्थायी दाग लगा और जिन अपमानों से उनके परिवार गुजरे उनकी कोई भरपाई नहीं हो सकती। चिंता सिर्फ यह नहीं कि निर्दोषों को गलत आरोपों में जेल भेजा गया, बल्कि यह भी कि बिना किसी मुकदमे के, बिना न्यायिक जांच के भीड़ ने मुसलमानों को सजा देनी शुरू कर दी। दादरी में मोहम्मद अखलाक की हत्या, अलवर में पेहलू खान की पीट-पीटकर हत्या, झारखंड में तबरेज अंसारी को जबरन धार्मिक नारा बुलवाने के बाद मार दिया जाना-ये सभी घटनाएँ ऐसी हैं जिन्होंने जनता को भीड़तंत्र में बदला है जो कानून और न्याय की जगह अफवाह तथा धार्मिक उन्माद में बदला है। कई मामलों में आरोपी खुलेआम घूमते रहे, वीडियो सबूतों के बावजूद अदालतों में कमजोर गवाही और राजनीतिक दबावों ने न्याय प्रक्रिया को अस्त-व्यस्त किया।
इसी दशक का एक और चिंताजनक अध्याय है-‘लव जिहाद’ का गढ़ा हुआ नैरेटिव। भारत सरकार ने संसद में स्वीकार किया कि लव जिहाद जैसा कोई प्रमाणित डेटा मौजूद नहीं है। NIA ने केरल के मामलों की जांच में भी किसी संगठित साजिश का प्रमाण नहीं पाया। इसके बावजूद कई राज्यों ने इस राजनीतिक शब्द को कानूनी रूप दे दिया। उत्तर प्रदेश में 2020 के बाद दर्ज हुए 163 मामलों में 208 लोगों पर आरोप लगे और सभी के सभी मुसलमान थे। इनमें से एक भी मामले में दोष सिद्ध नहीं हो पाया। कई मुकदमे पुलिस ने ही झूठे मानकर वापस लिए, लेकिन कानून ने काम तो कर दिया। युवाओं को जेल, परिवारों को अपमान और समाज में मुस्लिम युवक को प्रेम-संबंध का भी अपराधी बना दिया। कर्नाटक में अरबाज मुल्ला की बर्बर हत्या इसी उन्माद की परिणति है।
राजनीति में भी मुस्लिम पहचान को अपराध की तरह स्थापित करने की कोशिश की गई। उत्तर प्रदेश में आजम खान के परिवार पर लगभग 89 मुकदमे दायर किए गए, जिनमें बकरी चोरी जैसे हास्यास्पद आरोप भी शामिल थे। लगभग दो वर्षों तक कारावास और कानूनी लड़ाई के बाद धीरे-धीरे अदालतों ने एक-एक कर राहत दी, लेकिन राजनीतिक उद्देश्य शायद अब भी पूरा नहीं हुआ था, जिससे जेल से रिहा होने के बाद फिर फर्जी पैनकार्ड के मामले में पिता-पुत्र को 7 वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। इसी तरह डॉ. कफील खान को CAA विरोध में दिया गया भाषण खतरनाक बताकर एनएसए के तहत महीनों जेल में रखा गया जबकि हाई कोर्ट ने साफ कहा कि उनके भाषण में न तो हिंसा थी, न कोई उकसावा। दिल्ली दंगों के मामलों में उमर खालिद, शर्जील इमाम और गुलफिशा फातिमा जैसे कार्यकर्ता कठोर UAPA के तहत वर्षों से जेल में हैं, जबकि उनके खिलाफ अब तक किसी ठोस सबूत का अभाव खुद न्यायिक बहसों में सामने आता रहा है। अपराधी को उसके अपराध के मुताबिक सजा मिलनी चाहिए मैं इसी का पक्षधर हूं, लेकिन उस अपराध का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। यह भी सही है कि कई मुस्लिम आरोपी आतंकवादी घटनाओं में दोषी पाए गए और उन्हें न्यायपालिका ने कठोरतम सजाएँ दीं। यासीन भटकल, असदुल्लाह अख्तर, तहसीन अख्तर, एजाज शेख और अहमदाबाद धमाकों के 38 दोषियों को मृत्युदंड मिला। इससे स्पष्ट है कि अपराधी चाहे किसी भी धर्म का हो, न्यायपालिका अंततः सबूतों के आधार पर सजा देती है। लेकिन देश की समस्या यह नहीं कि अपराधियों को सजा मिली समस्या यह है कि निर्दोषों को भी ‘अपराधी’ मानने की आदत समाज और पुलिस प्रशासन में गहराती जा रही है।
एक लोकतांत्रिक समाज की पहचान में यह जरूरी है कि वह अपने सबसे कमजोर और संवेदनशील समूहों को कितना सुरक्षित रखता है। दुर्भाग्य से पिछले वर्षों में स्थिति उलटी दिखती है, जहाँ मुसलमानों के प्रति डर, संदेह और नफरत बढ़ती गई। टीवी डिबेटों में तथ्य की जगह उत्तेजना का ट्रेंड बनाया गया है। सोशल मीडिया पर फर्जी वीडियो और भ्रामक संदेशों ने डिजिटल भीड़-हिंसा को जन्म दिया। गांवों-मुहल्लों में लोगों की समझ पर अब वास्तविकता कम और वायरल संदेशों ने जगह बनाया है। भारत के लिए यह समय गंभीर आत्ममंथन का समय है। किसी समुदाय को सामूहिक रूप से अपराधी बताने का अर्थ है न्याय, संविधान और मानवता पर सामूहिक हमला। जरूरत है कि पुलिस जांच वैज्ञानिक और निष्पक्ष हो, प्रशासन राजनीतिक दबावों से मुक्त हो, मीडिया जिम्मेदार हो और समाज यह समझे कि अपराध का कोई धर्म नहीं होता। भारत का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब व्यक्ति की पहचान उसके धर्म से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और कर्म से तय होगी।
सत्यम प्रजापति
सामयिक विमर्शकार
