नए चार लेबर कोड की वास्तविकता
भारत ने पिछले सात दशकों के दौरान लागू 29 बिखरे हुए श्रम कानूनों को बदलकर चार नए लेबर कोड लाने का निर्णय लिया है। इन कोडों में मज़दूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़े व्यापक प्रावधान शामिल किए गए हैं। सरकार का दावा है कि पुराने कानून जटिल, उलझे हुए और उद्योग विकास के अनुकूल नहीं थे। वहीं मजदूर संगठनों और वामपंथी विचारधारा ने इन कोडों को मजदूरों के अधिकारों पर हमला बताया है। लेकिन निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो इन चारों कोड का उद्देश्य श्रम कानूनों को सरल, आधुनिक और निवेश-अनुकूल बनाना बताया गया है। पुराने श्रम कानूनों में परिभाषाओं की असमानता, प्रक्रियाओं की जटिलता और अनुपालन की कठिनाइयाँ थीं। उद्योग जगत का मानना था कि श्रम सुधार न होने के कारण भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रह रहा था, परंतु मजदूर पक्ष का कहना है कि सुधार के नाम पर उनके अधिकारों को कमजोर किया जा रहा है।
एक ओर, सरकार का दावा है कि नए कोड रोजगार, मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा सुधारेंगे, वहीं दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि मजदूरों की सौदेबाज़ी शक्ति और नौकरी की सुरक्षा दोनों कम होंगी। इसी दोहरापन की वजह से इन कोडों पर व्यापक बहस स्वाभाविक है। महत्वपूर्ण बात यह है कि चारों कोड अभी तक पूरे देश में पूर्ण रूप से लागू नहीं हुए हैं। राज्यों को अपने-अपने नियम (Rules) अधिसूचित करने थे, लेकिन अनेक राज्यों ने आज तक प्रक्रिया पूरी नहीं की। ऐसे में इन कोडों के वास्तविक प्रभाव का आकलन करना अभी भी कठिन है। एक तरफ इनके लाभ कागज़ों में लिखे हुए हैं, दूसरी ओर मजदूरों के बीच चिंताएँ व्यवहारिक रूप से मौजूद हैं। इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले दोनों पक्षों को समझना आवश्यक है।
नए लेबर कोड के फायदे
नए कोडों का सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष 29 पुराने कानूनों को चार संहिताओं में समेटना है। इससे प्रणाली अधिक सरल और स्पष्ट हो जाती है। उद्योग जगत वर्षों से श्रम कानूनों की जटिलता को एक बड़ी बाधा मानता रहा है। अगर नए कोड लागू होते हैं तो कंपनियों को अनुपालन आसान होगा और इससे रोजगार सृजन को गति मिल सकती है। इसके साथ ही राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन की अवधारणा भी इन कोडों के भीतर शामिल की गई है, जो पूरे देश में मजदूरी को एक समान आधार प्रदान कर सकती है। यह मजदूर हित में बड़ा कदम हो सकता है, बशर्ते इसे वैज्ञानिक आधार पर लागू किया जाए।
सामाजिक सुरक्षा को भी नए कोडों में विस्तार देने का प्रयास किया गया है। पहली बार gig workers और platform workers—जैसे Uber, Ola, Swiggy, Zomato से जुड़े श्रमिक—को कानूनन सामाजिक सुरक्षा का हिस्सा माना गया है। यह भारतीय श्रम बाज़ार में ऐतिहासिक बदलाव है, क्योंकि ये करोड़ों युवा अब तक किसी भी सुरक्षा व्यवस्था से बाहर थे। इसके अलावा self-certification, डिजिटल निरीक्षण और ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन जैसे साधनों से भ्रष्टाचार कम होने और पारदर्शिता बढ़ने की संभावना है।
हाजिर जरूरत को देखते हुए फिक्स्ड टर्म रोजगार को भी वैधता दी गई है। यह कंपनियों को लचीले रोजगार पैटर्न अपनाने की सुविधा देता है, और मजदूरों को अवधि के दौरान PF-ESI जैसे लाभों का अधिकार मिलता है। यदि इन प्रावधानों को संतुलित तरीके से लागू किया जाए, तो ये सुधार रोजगार बाज़ार में स्थिरता ला सकते हैं और वैश्विक निवेश आकर्षित कर सकते हैं।
नए लेबर कोड के नुकसान
इन कोडों पर सबसे गंभीर आलोचना यह है कि ये मजदूरों की नौकरी सुरक्षा को कमजोर करते हैं। औद्योगिक संबंध संहिता के तहत 100 से 300 मजदूरों तक की इकाइयों को बिना सरकारी अनुमति के छंटनी या लेऑफ़ की छूट दे दी गई है। इससे कंपनियों को अधिक लचीलापन मिलता है, लेकिन मजदूरों की नौकरी अत्यंत अस्थिर हो जाती है। इसी तरह हड़ताल पर 60 दिन पहले नोटिस देने का प्रावधान मजदूरों के सामूहिक प्रतिरोध अधिकार पर सीधा प्रभाव डालता है। यह लोकतांत्रिक अधिकारों की दृष्टि से चिंताजनक माना गया है।
निरीक्षण प्रणाली को डिजिटल और random बनाना भी दोधारी तलवार है। जहाँ एक ओर यह भ्रष्टाचार रोक सकता है, वहीं दूसरी ओर जानबूझकर कम निरीक्षण करने से कानून उल्लंघन छुपाने में सुविधा मिल सकती है। खासकर छोटे कारखानों, दुकानों और असंगठित क्षेत्र में मजदूरों का शोषण बढ़ने का खतरा है। फिक्स्ड टर्म रोजगार भी मजदूरों को स्थायी नौकरी के विकल्प से दूर कर सकता है, क्योंकि कंपनियाँ स्थायी भर्ती से बच सकती हैं।
सामाजिक सुरक्षा संहिता में कई प्रावधान सरकार की अधिसूचनाओं पर निर्भर हैं। यानी gig workers को सुरक्षा कब, कैसे और किस रूप में मिलेगी—यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसी तरह OSH Code केवल 10+ मजदूरों वाले प्रतिष्ठानों पर लागू होता है, जबकि भारत में करोड़ों मजदूर 1–9 कर्मचारियों वाली इकाइयों में काम करते हैं। इसका मतलब है कि असंगठित क्षेत्र की विशाल आबादी अभी भी सुरक्षा के दायरे में नहीं आती। यही वह बिंदु है जहाँ आलोचक कहते हैं कि नए कोड मजदूरों की सुरक्षा घटाते हैं, बढ़ाते नहीं।
निष्कर्षत: इन कोडों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार, उद्योग और समाज इन्हें किस तरह लागू करते हैं और मजदूरों के हितों को किस स्तर तक प्राथमिकता देते हैं। भारत के भविष्य के लिए आवश्यक है कि सुधार और सुरक्षा दोनों साथ-साथ चले क्योंकि बिना मजदूर की गरिमा और अधिकारों के कोई भी अर्थव्यवस्था समृद्ध नहीं हो सकती।
-सत्यम प्रजापति
सामयिक विमर्शकार
