आज़मगढ़। भारत की नदियां केवल जलधारा भर नहीं हैं, बल्कि वे हमारी संस्कृति, परंपरा और जीवनदायिनी धारा का प्रतीक हैं। जिस प्रकार गंगा को “मां गंगा” और यमुना को “मां यमुना” कहा जाता है, उसी तरह आज़मगढ़ की धरा पर बहने वाली पावन नदी तमसा को भी श्रद्धा से “मां तमसा” कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी नदी के तट पर महर्षि विश्वामित्र के साथ भगवान श्रीराम और लक्ष्मण ने असुरों से ऋषियों की रक्षा के लिए पदार्पण किया था। यही कारण है कि तमसा नदी आज भी आस्था और इतिहास का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।
तमसा नदी के प्रति श्रद्धा और स्वच्छता का संदेश देने के उद्देश्य से 14 अगस्त 2012 को आज़मगढ़ के सिधारी क्षेत्र में मां तमसा आरती की शुरुआत की गई। इस परंपरा की नींव रखी थी समाजसेवी अनिल कुमार सिंह ने। गंगा और यमुना तट पर होने वाली आरती से प्रेरित होकर उन्होंने निश्चय किया कि तमसा जैसी जीवनदायिनी नदी के लिए भी ऐसा आयोजन होना चाहिए। उनका उद्देश्य केवल धार्मिक भावनाओं को जगाना नहीं था, बल्कि यह संदेश भी देना था कि – “मां तमसा को स्वच्छ रखें, सुंदर रखें।”
शुरुआत में यह आयोजन छोटा था, लेकिन समय बीतने के साथ इसकी महत्ता और व्यापकता बढ़ती गई। पहले ही वर्ष इसकी वर्षगांठ पर भंडारे का आयोजन किया गया, जिसने समाज को जोड़ने का काम किया। वर्ष 2017 में जब आरती को पांच वर्ष पूरे हुए, तब भव्य भंडारे का आयोजन किया गया। इस अवसर पर अयोध्या से आए संतों ने भाग लिया और श्रद्धालुओं को आशीर्वचन दिया। तब से यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं रहा, बल्कि सामाजिक एकता और धार्मिक सद्भाव का पर्व बन गया।
हर पूर्णिमा को नियमित रूप से यह आरती आयोजित होती है। अब यह 13 वर्षों की अटूट परंपरा बन चुकी है। खास बात यह है कि हर पांचवें वर्ष पर भव्य भंडारा आयोजित किया जाता है, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों के लोग, स्वयंसेवी संस्थाएं और संत-महात्मा शामिल होते हैं। इस मंच पर समाज की एकता और सहयोग का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है।
इस वर्ष की मां तमसा आरती की खासियत यह रही कि इसे सामान्य समय से पहले करना पड़ा। दरअसल, चंद्र ग्रहण के कारण दोपहर 1 बजे से सूतक लग रहा था। इसी वजह से जहां आरती प्रायः सायंकाल होती है, वहीं इस बार श्रद्धालुओं ने दोपहर 12 बजे ही मां तमसा की आरती उतारी।
आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और समाज के प्रबुद्ध लोग उपस्थित हुए। इनमें सभासद विजय चंद्र यादव, पूर्व सभासद पुरुषोत्तम सिंह, राजेश कुमार पांडेय, सुधांशु कुमार पांडेय, सुनील कुमार वर्मा और गायक कलाकार राजेश रंजन विशेष रूप से शामिल रहे। आरती के दौरान भक्तिमय वातावरण में “मां तमसा” के जयकारे गूंजते रहे।
अनिल कुमार सिंह ने बताया कि उनका प्रयास केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य नदी की स्वच्छता और संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता लाना है। वे कहते हैं – “यदि हम अपनी नदियों को स्वच्छ और सुरक्षित रखेंगे तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध जल और स्वस्थ पर्यावरण मिल पाएगा।”
आज मां तमसा आरती केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन बन चुकी है। यह आयोजन न केवल श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और समाजिक एकता का संदेश भी फैलाता है। यही वजह है कि अब यह आरती आज़मगढ़ की पहचान बन चुकी है और हर वर्ष नई ऊर्जा और उत्साह के साथ आगे बढ़ रही है।
