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हौसलों की उड़ान: आज़मगढ़ की तरन्नुम आरा ने UGC-NET 2025 में रचा इतिहास

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हौसलों की उड़ान: आज़मगढ़ की तरन्नुम आरा की प्रेरणादायक कहानी
— एक ऐसी बेटी की दास्तान, जिसने सीमाओं को तोड़कर रचा कीर्तिमान

उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले का एक छोटा सा गांव — नेवादा, पोस्ट बीबीपुर कदीम। ज़्यादातर लोग इस गांव का नाम शायद ही जानते हों, लेकिन इसी गांव की एक बेटी ने आज पूरे जिले, प्रदेश और देश को गर्व से भर दिया है। नाम है — तरन्नुम आरा

तरन्नुम ने 2025 की UGC-NET परीक्षा में इतिहास विषय से 96.06 पर्सेंटाइल के साथ असिस्टेंट प्रोफेसर और पीएच.डी. की पात्रता हासिल कर अपने गांव, परिवार और समाज का नाम रोशन कर दिया है। यह सफलता केवल एक परीक्षा पास करने की बात नहीं है, यह कहानी है संघर्ष की, विश्वास की, और उन सपनों की जो ज़मीन से उड़ान भरकर आसमान तक पहुँचते हैं।

शुरुआत एक छोटे से गांव से

नेवादा गांव में जन्मी तरन्नुम आरा का बचपन बहुत साधारण लेकिन अनुशासित रहा। उनके पिता अंसार अहमद और माता ने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी। परिवार का रहन-सहन आम ग्रामीण परिवारों जैसा था, लेकिन सोच बड़ी और सपने ऊँचे थे।

बचपन से ही तरन्नुम पढ़ाई में होशियार थीं। गांव के प्राथमिक विद्यालय से शुरुआत हुई, फिर उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने निरंतर संघर्ष किया। समाज की परंपराओं, आर्थिक दिक्कतों, और संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। उनके भीतर एक आग थी — कुछ कर दिखाने की, और वह भी पढ़ाई के ज़रिए।

सपनों की सीढ़ी: शिक्षा

तरन्नुम को पढ़ाई का महत्व उनके परिवार से ही मिला। उनके दादा मरहूम मास्टर शब्बीर अहमद, उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में अध्यापक थे, जिन्होंने शिक्षा की मशाल जलाए रखी। उसी विरासत को तरन्नुम ने आगे बढ़ाया।

UGC-NET जैसी कठिन परीक्षा में सफलता पाना आसान नहीं होता। विशेषकर जब तैयारी एक ग्रामीण परिवेश में हो, और संसाधन सीमित हों। लेकिन तरन्नुम ने अपने कठिन परिश्रम, अनुशासन और मानसिक दृढ़ता के बल पर इस परीक्षा में शानदार 96.06 पर्सेंटाइल हासिल कर दिखाया कि लक्ष्य कितना भी ऊँचा हो, अगर इरादा मजबूत हो तो कुछ भी असंभव नहीं।

प्रयागराज में एक नया सपना

वर्तमान में तरन्नुम प्रयागराज (इलाहाबाद) में रहकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रही हैं। उनका सपना है — प्रशासनिक सेवा में आकर वंचित और पिछड़े वर्गों के लिए काम करना, और शिक्षा को एक ऐसा हथियार बनाना जिससे समाज में बदलाव आ सके।

उनका मानना है कि यह सफलता सिर्फ उनकी नहीं, उन सभी बेटियों की है जो सीमाओं के बावजूद आगे बढ़ना चाहती हैं। उनके शब्दों में —
“जब परिवार साथ खड़ा होता है, तो एक लड़की की उड़ान आसमान से भी ऊंची हो सकती है।”

एक परिवार, एक मिशन: शिक्षा

तरन्नुम का परिवार एक सच्चा उदाहरण है कि जब पूरा परिवार शिक्षा और विकास के लिए एकजुट होता है, तो असंभव कुछ भी नहीं रहता। उनके पिता अंसार अहमद ने बच्चों की शिक्षा के लिए अपने सपनों को त्याग दिया, मेहनत की, संघर्ष किया, लेकिन कभी शिकायत नहीं की।

उनकी छोटी बहन स्नातक में टॉपर रह चुकी हैं, गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मानसिक मंदता (Mental Retardation) के क्षेत्र में RCI से लाइसेंस प्राप्त एजुकेटर हैं। उनके बड़े भाई इंजी. जमाल अख्तर एक मल्टीनेशनल कंपनी में इंस्पेक्शन इंजीनियर हैं। डॉ. शमीम अख्तर, जो मनोविज्ञान में पीएच.डी. हैं, मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं। एक भाई AMU से कानून की पढ़ाई कर रहे हैं और न्यायिक सेवा में जाने का सपना देख रहे हैं। चौथे भाई मेडिकल क्षेत्र में कैरियर बना रहे हैं। उनकी भाभी भी मनोविज्ञान में मास्टर्स कर रही हैं।

यह परिवार संघर्ष की मिसाल है, जो समाज को यह संदेश देता है कि “अगर घर में शिक्षा को पूजा समझा जाए, तो हर बच्चा देवता बन सकता है।”

बेटियों की जीत, समाज की जीत

तरन्नुम की सफलता सिर्फ उनके लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए एक प्रेरणा है। एक मुस्लिम परिवार की बेटी, जिसने सामाजिक परंपराओं और रूढ़ियों को तोड़ते हुए शिक्षा के क्षेत्र में यह मुकाम हासिल किया, वह देश भर की उन लड़कियों के लिए मिसाल बन चुकी है जो सपने देखती हैं, लेकिन डरती हैं उन्हें पूरा करने से।

उनकी यह उपलब्धि दर्शाती है कि जब बेटियों को अवसर दिए जाते हैं, तो वे सिर्फ अपने परिवार को नहीं, पूरे समाज को आगे ले जाती हैं। तरन्नुम की तरह हर बेटी को यह विश्वास होना चाहिए कि वह जो चाहे कर सकती है — बस उसे सपनों पर यकीन होना चाहिए और अपनों का साथ।

तरन्नुम की प्रेरणा क्या है?

उनका जवाब बड़ा सरल लेकिन भावुक होता है —
“मेरे माता-पिता की आंखों में जो सपने थे, उन्हें सच करना मेरा धर्म था। जब पापा रात-दिन मेहनत करते थे और मां मेरे लिए दुआएं पढ़ती थीं, तब मेरे पास सिर्फ एक ही रास्ता था — मेहनत।”

उनकी यह भावना बताती है कि सपनों को पंख मेहनत से नहीं, भावनाओं से मिलते हैं

अंत में एक संदेश

आज जब युवा अक्सर असफलता से घबराकर रास्ता बदल लेते हैं, तरन्नुम जैसी बेटियां हमें यह सिखाती हैं कि हार का मतलब अंत नहीं होता, बल्कि एक नया शुरुआत होती है। उनकी कहानी बताती है कि “संघर्ष अगर सच्चा हो और रास्ता शिक्षा का हो, तो सफलता ज़रूर मिलती है।”

निष्कर्ष:

तरन्नुम आरा की यह सफलता सिर्फ एक प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि एक आंदोलन है — उस सोच का, जो बेटियों को पंख देती है; उस विश्वास का, जो गांवों से निकलकर देश को बदलने की क्षमता रखता है; और उस परिवार का, जो यह मानता है कि शिक्षा ही असली इबादत है।

आजमगढ़ की इस बेटी को सैल्यूट, जो आने वाली पीढ़ियों की रोल मॉडल बन चुकी हैं।

– CIB India News विशेष रिपोर्ट

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