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देश के मशहूर साहित्यकार कुंद जी ने पूरे किये जीवन के 75 बसंत

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रिपोर्ट  : वसीम अकरम, आज़मगढ़

आज़मगढ़ जिले के मूर्धन्य साहित्यकार जगदीश बरनवाल कुंद ने अपने जीवन के 75 वर्ष पूर्ण किया ..जीवन के इन 75 सालों में आपने तमाम उतार चढ़ाव देखने के साथ ही साहित्य के क्षेत्र में ऐसा योगदान दिया ..जिससे ये जनपद सिर्फ देश ही नहीं बल्कि अपनी वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने में सफल रहा है …जगदीश बरनवाल कुंद जी के 75 बसंत पूर्ण करने के उपलक्ष्य में उनके आवास पर पहुँच कर बहुत सारे लोगों ने उन्हें जन्म दिवस की बधाई दिया ..इस अवसर पर एक काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया …जिसमे जिले की मशहूर कवियत्री द्वय आशा सिंह और सरोज जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से शमा बांधा ..वहीँ लोक दायित्व संस्था प्रमुख पवन सिंह , प्रभु नारायण प्रेमी जी , पत्रकार और मशहूर उद्घोषक संजय पाण्डेय , कुंद जी के गुरु , पत्रकार वसीम अकरम भी मौजूद रहे .. सभी लोगों ने कुंद जी की शान में अपनी रचनाओं को सुनाया , जिसमे पवन सिंह द्वारा लिखित कविता पर सब वाह – वाह कर उठे ..उन्होंने कहाकि वस्तुतः कुंद जी ऐसे साहित्यकार हैं जो आजमगढ़ के लिए विशाल शब्दकोश हैं। यदि सच में समाज के हित से ही साहित्य बनता है तो इस कसौटी पर खरे उतरने वाले लोग कुंद जी अलावा बहुत कम हैं। उनके लिए अंगुलियों की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। यदि आजमगढ़ के उदात्त साहित्यिक विरासत का वर्तमान वारिस देखा जाय तो कुंद जी ही हैं। साहित्य की शायद ही कोई विधा होगी जिस में आप सिद्धहस्त न हों।
वहीँ पत्रकार वसीम अकरम ने प्रस्ताव दिया कि ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध हमारे साहित्यकार एवं जनसरोकारों से जुड़े लोग इस उम्र में अलग थलग पड़ जाते हैं, तो हमें जन्मदिन और अन्य दिनों में भी उनके यहां पहुंचकर सानिध्य प्राप्त करना चाहिए…ऐसे मौकों पर उन तक पहुंचकर उनके अद्भुत कार्यों की प्रशंसा भी करना चाहिए …वसीम अकरम ने कहाकि हम सभी अपने बड़ों से दूर होते जा रहे हैं ..जबकि ये हमारे लिए किसी वट वृक्ष के समान होते हैं …
वहीँ अगर जगदीश बरनवाल कुंद जी की रचनाओं की बात की जाये तो उन्होंने बहुत सारी ऐसी साहित्यिक किताबें लिखी हैं जो अपने आप में अद्भुत हैं …जिनमे विदेशी विद्वानों का हिन्दी प्रेम, विदेशी विद्वानों का संस्कृत प्रेम,राहुल सांकृत्यायन:जिन्हें सीमायें नहीं रोक सकीं, गुरुभक्त सिंह “भक्त”:जीवन और साहित्य , (जीवनी),सप्तमुक्ता (बाल नाटक संग्रह ),बिरही बिसराम(भोजपुरी नाटक ),अनुरंजिता (लेख संग्रह),सूरज का रूप, जीवन लय(कविता संग्रह ),सच के करीब( कहानी संग्रह ), विविध सन्दर्भों में आजमगढ़ (1जनपद का सांस्कृतिक इतिहास)पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।पांच पाण्डुलिपियाँ अभी अप्रकाशित हैं ।पढने और लिखने की रुचि तथा जिजीविषा अभी भी बनी हुई है ..ऐसे में हमें एक से बढ़कर एक शाहकार देखने और पढने को मिलेंगे ..
डॉ. शशिप्रकाश भूषण श्रीवास्तव प्रशांत जी ने इस सभा की अध्यक्षता की ….प्रेमी जी ने सभा को संयोजित और संचालित किया….. कवियों ने अपनी कविता पढ़ी, विद्वतजनों ने भाव प्रकट किए…. आशा जी और सरोज जी ने सोहर गाया…संजय पांडे ने मुक्तक पढ़ी, कुल मिलाकर वातावरण भावविभोर कर गया…

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