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धार्मिक जनमोर्चा की ओर से ‘सांप्रदायिक सद्भाव में धर्म की भूमिका‘ पर विचार गोष्ठी का आयोजन

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धार्मिक जनमोर्चा की ओर से ‘सांप्रदायिक सद्भाव में धर्म की भूमिका‘ पर विचार गोष्ठी का आयोजन

लखनऊः अलग-अलग धर्म, जाति, भाषा और संस्कृति के बावजूद हम सदियों से भारत में एक साथ मिलजुल कर रहते चले आए हैं, विविधता और बहुलता ही भारत को विश्व में अनोखा और महान बनाती है। इसी एकता और अखंडता से हम ने आजादी हासिल की परंतु दुर्भाग्यवश इस विरासत में तेजी से गिरावट आई है। जिस का मुख्य कारण नफरत और सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रूवीकरण है। सांप्रदायिक नफरत के इस माहौल के लिए धर्म जिम्मेदार नहीं है, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए धर्म का दुरुपयोग करने वाले लोग जिम्मेदार हैं। ऐसे में धार्मिक गुरुओं की भूमिका बहुत ही अहम हो जाती है कि वह सामाजिक शान्ति और सद्भाव के लिए आगे आयें।
इसी कर्तव्य को सामने रखते हुए धार्मिक जनमोर्चा की ओर से ‘सांप्रदायिक सद्भाव में धर्म की भूमिका‘ के विषय पर शनिवार को गांधी भवन लखनऊ के “करण भाई सभागार” में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया।
विचार गोष्ठी में अपने विचार रखते हूये जमात ए इस्लामी हिंद के वारिस हुसैन ने कहा कि सामाजिक चुनौतियों को देखते हुए हमें आपसी मेलजोल, एक-दूसरे की आस्था, संस्कृति और परंपराओं को जानने, संचार, संवाद और आम सहमति वाले मुद्दों पर मिलकर काम कर के माहौल को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। चूंकि हम एक ऐसा समाज हैं जहां बड़ी संख्या में लोग अपनी पसंद के धर्म का पालन करते हैं, इसलिए धार्मिक नेताओं की भूमिका और जिम्मेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है। धर्मगुरुओं को एक साथ आकर नैतिक मूल्यों, सांप्रदायिक सद्भाव, आपसी सम्मान और आपसी विश्वास को सुदृढ़ करने की ज़रूरत है।
मुख्य ग्रंथी गुरुद्वारा नाका हिंडोला ज्ञानी सुखदेव सिंह ने कहा कि जब तक मन में नियत अच्छी ना हो तब तक आप का भला नहीं हो सकता है. यदि आप किसी के साथ अच्छा करेंगे तो आप के साथ भी अच्छा होगा. आज समाज में बहुत सी बुराइयां फैली हुई हैं इन बुराइयों को ख़त्म करने में धार्मिक गुरू की अहम भूमिका होती है. हम लोगों की जिम्मेदारी है कि समाज के प्रति जागरूक हों।
ईसाई धर्मगुरु फादर आर. बी. रॉय ने कहा कि हम एक परिवार का हिस्सा हैं, यदि परिवार में कोई समस्या आती है तो परिवार के मुखिया लोगों की ये जिम्मेदारी होती है कि इस समस्या के समापन के लिए आगे आएं.
बौद्ध समाज के प्रतिनिधि हरि लाल बौद्ध ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि सही बोलने और सही काम करने वाले को कभी डरना नहीं चाहिए. आज इस गोष्ठी में जो बातें सामने आयी हैं वो आज की आवश्यकता है. इस संदेश को यहां से आगे भी जाना चाहिए और गाँव गाँव तक इस संदेश को पहुंचाना है.
जैन समाज के प्रतिनिधि पी. के. जैन ने कहा कि हमारी आत्मा कभी भी नहीं कहती कि आप पाप करें, लेकिन हम पापी क्यूँ हैं इस का मतलब है कि हम स्वंय अपने अपने धर्मों का अनुपालन नहीं करते हैं. हम केवल धार्मिक होने का दावा करते हैं जबकि हमारा कोई कार्य धर्म के अनुसार नहीं होता है.
शिआ चांद कमेटी के अध्यक्ष मौलाना सैफ अब्बास नकवी ने कहा कि समाज में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जो आपस में नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं, अभी भी समाज में मुहब्बत करने वालों की संख्या अधिक है। अपने फायदे के लिए भाई को भाई से लड़ाना, राजनैतिक फायदे के लिए समाज में नफरत फैलाना निंदनीय है. ये देश हमेशा से आपसी मेल मुहब्बत और सौहार्द का देश रहा है. इस विरासत को बचाना हम सबकी जिम्मेदारी है।
जामिया तुल फलाह के डायरेक्टर मौलाना ताहिर मदनी ने कहा कि विभिन्न धर्मों के जो रहनुमा हैं उन्हें चाहिए कि जनता तक इस पैगाम को पहुंचाए और आपस में अगर दूरियां पैदा हो रही हैं तो उन्हें खत्म करने की कोशिश करें. अगर समाज के अंदर नफरत, घृणा होगी तो समाज कमजोर होगा इस लिए हमें अपने समाज और मुल्क को कमजोर नहीं होने देना है।
विचार गोष्ठी का आरम्भ असदुल्लाह आज़मी के प्रारम्भिक भाषण से हुआ, कार्यक्रम का संचालन मुहम्मद साबिर खान ने किया.
गोष्ठी 100 से अधिक लोग मोजूद रहे

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