हिंदी सिनेमा में हॉरर फिल्मों का आकर्षण हमेशा से दर्शकों को अपनी ओर खींचता रहा है। समय के साथ इस जॉनर की लोकप्रियता और प्रस्तुति दोनों में बदलाव आया है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानियां आज भी लोगों को हैरान कर देती हैं। बॉलीवुड में भूतिया फिल्मों के ट्रेंड को नई पहचान देने का श्रेय रामसे ब्रदर्स को जाता है, जिन्होंने सीमित संसाधनों में भी डर का ऐसा माहौल रचा, जो आज भी याद किया जाता है। हाल ही में फिल्म निर्माताओं और कलाकारों ने हॉरर फिल्मों की शूटिंग प्रक्रिया, तकनीक और कुछ अनसुने अनुभव साझा किए हैं, जो इस जॉनर की सच्चाई को सामने लाते हैं।
कब्रिस्तान में रातभर होती थी शूटिंग
रामसे परिवार की अगली पीढ़ी को आगे बढ़ा रहे दीपक रामसे ने बताया कि पहले के दौर में हॉरर फिल्मों की शूटिंग ज्यादातर असली लोकेशनों जैसे कब्रिस्तान, पुराने खंडहर और हवेलियों में की जाती थी। शूटिंग का समय भी खास होता था। टीम रात 9 बजे कब्रिस्तान में प्रवेश करती और सुबह 4 बजे तक शूटिंग चलती थी। इसे ‘स्पेशल ग्रेवयार्ड शूट’ कहा जाता था। डरावना माहौल बनाने के लिए कृत्रिम सेट की बजाय वास्तविक जगहों को प्राथमिकता दी जाती थी।
दीपक रामसे ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान जब कब्रिस्तान में गड्ढा खोदा गया, तो वहां से एक वास्तविक लाश निकल आई। इस घटना से सेट पर हड़कंप मच गया और कुछ समय के लिए शूटिंग रोकनी पड़ी।

ताबूत में बंद हुआ कलाकार, बाल-बाल बची जान
फिल्म पुराना मंदिर की शूटिंग के दौरान एक कलाकार को ताबूत में बंद करने का दृश्य फिल्माया जा रहा था। जर्मनी से मंगाया गया ताबूत गलती से लॉक हो गया और कई मिनट तक खुल नहीं पाया। अंदर बंद कलाकार की सांसें रुकने की स्थिति बन गई थी। काफी मशक्कत के बाद ताबूत खोला गया और कलाकार सुरक्षित बाहर निकाला गया। इस घटना ने पूरी टीम को झकझोर दिया था।
साउंड रिकॉर्डिंग के लिए कब्रिस्तान का सहारा
रामसे ब्रदर्स में किरण रामसे साउंड इफेक्ट्स का काम संभालते थे। वे कब्रिस्तान जाकर हवा की आवाज, जानवरों की हलचल और अन्य प्राकृतिक ध्वनियां रिकॉर्ड करते थे। एक बार रिकॉर्डिंग सुनते समय टेप में किसी व्यक्ति के सांस लेने की आवाज सुनाई दी, जबकि रिकॉर्डिंग के समय वहां कोई मौजूद नहीं था। इस घटना ने उन्हें भी हैरान कर दिया।
मेकअप और तकनीक में आया बदलाव
पहले के दौर में VFX तकनीक उपलब्ध नहीं थी, इसलिए डरावने दृश्य तैयार करने के लिए मेकअप और साउंड इफेक्ट्स पर ज्यादा निर्भरता होती थी। कलाकारों को भूतिया लुक देने के लिए लंबे समय तक मेकअप किया जाता था। कई बार 8-9 घंटे तक लगातार प्रोस्थेटिक मेकअप किया जाता था, जिससे कलाकारों को खाने-पीने में भी कठिनाई होती थी। आज के समय में डिजिटल तकनीक और विजुअल इफेक्ट्स ने इस प्रक्रिया को काफी आसान बना दिया है।

सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म की कहानी
फिल्म वीराना की कहानी भी एक वास्तविक घटना से प्रेरित बताई जाती है। निर्देशक श्याम रामसे को एक बार यात्रा के दौरान एक महिला ने लिफ्ट मांगी, जिसकी हरकतें असामान्य थीं। इस घटना ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि बाद में उन्होंने इसी आधार पर फिल्म की कहानी तैयार की।
घने जंगलों में शूटिंग की चुनौती
हॉरर फिल्मों के लिए घने जंगल भी फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद होते हैं। मुंबई के संजय गांधी नेशनल पार्क जैसे स्थानों पर कई फिल्मों और टीवी शोज की शूटिंग हो चुकी है। लोकेशन मैनेजरों के अनुसार, शूटिंग के दौरान कई बार क्रू मेंबर्स को अजीब अनुभव होते हैं, जैसे आसपास किसी की मौजूदगी का एहसास होना। इसके अलावा जंगली जानवरों और कीड़ों से सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम भी करने पड़ते हैं।
हॉरर फिल्म बनाना सबसे मुश्किल काम
फिल्म निर्देशक सोहम शाह के अनुसार, थिएटर में बैठे सैकड़ों दर्शकों को एक साथ डराना फिल्म निर्माण का सबसे कठिन कार्य है। उनका कहना है कि अब दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए हॉरर फिल्मों में कॉमेडी और मनोरंजन का मिश्रण भी बढ़ा है।
हॉरर फिल्मों का सफर तकनीक और प्रस्तुति के स्तर पर भले ही बदल गया हो, लेकिन डर पैदा करने की चुनौती आज भी उतनी ही कठिन है। कब्रिस्तान की रातों से लेकर आधुनिक तकनीक तक, इस जॉनर ने हमेशा दर्शकों को रोमांचित किया है और इसके पीछे छिपे किस्से इसे और भी रहस्यमय बनाते हैं।
