आजमगढ़ : विकास प्राधिकरण की कार्रवाई अब केवल अवैध निर्माण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह मामला प्रशासनिक संवेदनशीलता, लोकतांत्रिक मूल्यों और गरीबों के अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। भाजपा से जुड़े एक बूथ अध्यक्ष के घर पर बुलडोजर चलाए जाने के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या किसी वीआईपी दौरे या “शोभा” बनाए रखने के नाम पर किसी परिवार का घर उजाड़ देना न्यायसंगत है।
मामला आजमगढ़ जिले के हरिहरपुर क्षेत्र का है, जहां आजमगढ़ विकास प्राधिकरण (एडीए) ने मंगलवार तड़के करीब 6 बजे एक निर्माणाधीन मकान को अवैध बताते हुए ध्वस्त कर दिया। एडीए अधिकारियों के अनुसार यह निर्माण बिना नक्शा स्वीकृत कराए उस भूमि पर किया जा रहा था, जो पहले महाविद्यालय (संगीत विद्यालय) के निर्माण के लिए आवंटित थी। प्राधिकरण का दावा है कि 21 तारीख को नोटिस चस्पा किया गया था और निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद नियमानुसार कार्रवाई की गई।
हालांकि, पीड़ित परिवार का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है। हरिहरपुर निवासी रामनयन और बृजेश का कहना है कि जिस जमीन पर वे मकान बना रहे थे, वह उनकी पुश्तैनी जमीन है। उन्होंने बताया कि वर्षों पहले उन्होंने स्कूल निर्माण के लिए अपनी जमीन दी थी, जिसके बदले प्रशासन की ओर से उन्हें दूसरी जमीन आवंटित की गई थी। उसी जमीन पर वे अपना आशियाना बना रहे थे।
पीड़ितों का आरोप है कि नोटिस देर रात चुपचाप चस्पा किया गया और उन्हें न तो 24 घंटे का पूरा समय मिला और न ही अपनी बात रखने का उचित मौका। रामनयन का कहना है कि नोटिस देखने के बाद वे तुरंत कचहरी पहुंचे और वकील से मिले, लेकिन संबंधित फाइल उस समय पूरी तरह तैयार नहीं थी। इससे पहले कि कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ती, भोर में जेसीबी पहुंच गई और मकान गिरा दिया गया।
बृजेश ने बताया कि उनके चाचा का मकान, जिसका निर्माण लगभग पूरा हो चुका था, उसे भी तोड़ दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि 28 तारीख को प्रस्तावित मुख्यमंत्री के दौरे को देखते हुए “स्कूल की शोभा खराब होने” का हवाला देकर जल्दबाजी में यह कार्रवाई की गई। परिवार का यह भी कहना है कि उन्हें किसी प्रकार के मुआवजे की बात नहीं कही गई, बल्कि यह चेतावनी दी गई कि ज्यादा विरोध करने पर कार्रवाई का खर्च भी वसूला जा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या लोकतंत्र में बिना पर्याप्त सुनवाई और समय दिए किसी का घर गिराना न्यायोचित है? क्या कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता है, या फिर गरीब और कमजोर वर्ग ही कार्रवाई का आसान निशाना बनते हैं?
फिलहाल पीड़ित परिवार ने जिलाधिकारी से मुलाकात कर नुकसान की भरपाई और मुआवजे की मांग की है। अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि क्या इस मामले का संज्ञान लेकर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या यह मामला भी प्रशासनिक फाइलों में दबकर रह जाएगा। यह कार्रवाई केवल एक मकान का ध्वस्तीकरण नहीं, बल्कि इंसाफ और लोकतंत्र की परीक्षा बनकर सामने आई है।
