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आज़मगढ़ रेलवे स्टेशन का मुद्दा गरमाया, सांसद धर्मेन्द्र यादव ने अधिकारियों को संसद घेरा….

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नई दिल्ली/आज़मगढ़  संसद के अंदर बुधवार को वह नज़ारा देखने को मिला, जब आज़मगढ़ के सांसद धर्मेंद्र यादव ने अपनी तेज़ तर्रार राजनीतिक शैली में रेल मंत्रालय को कटघरे में खड़ा कर दिया। अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत आज़मगढ़ रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास में हो रही देरी पर उन्होंने ऐसा हमला बोला, जिसने केंद्र सरकार की घोषणाओं की हकीकत को उजागर कर दिया।


सांसद ने सदन में कहा कि केंद्र सरकार अमृत भारत स्टेशन योजना को लेकर जमकर वाहवाही लूट रही है। पोस्टरों से लेकर भाषणों तक में विकास का डंका बज रहा है, लेकिन ज़मीन पर “विकास” फाइलों में अटका पड़ा है। आज़मगढ़ स्टेशन इस योजना में शामिल तो कर लिया गया, पर काम की रफ्तार कछुए से भी धीमी है।

उन्होंने तंज़ कसते हुए बताया कि सवाल पूछने से पहले उन्होंने स्टेशन अधिकारियों से बात की, मगर स्टेशन के सुपरिटेंडेंट तक यह नहीं बता सके कि काम पूरा कब होगा। यह सुनकर सदन में एक पल को सन्नाटा छा गया — और फिर राजनीति की गरमाहट अपने चरम पर पहुंच गई।


सांसद ने बेहद भावुक अंदाज़ में जनता की व्यथा को बयान करते हुए कहा कि आज़मगढ़ की धड़कन — कैफियात एक्सप्रेस — को प्लेटफार्म नंबर तीन पर लगाया जाता है। बुजुर्ग, बीमार और दिव्यांग यात्रियों को प्लेटफार्म बदलना पड़ता है, और यह यातना हर दिन उनकी मजबूरी बन चुकी है।

उन्होंने कहा—

“बुजुर्ग हमारे पास आकर बार-बार विनती करते हैं। लेकिन सरकार चुप है। उनकी आवाज़ हम यहां उठाते हैं, तो उम्मीद होती है कि सरकार उनकी तकलीफ समझे।”

सांसद को स्पीकर ने रोकना चाहा, पर धर्मेंद्र यादव नहीं रुके। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह “सिर्फ़ राजनीति नहीं”, बल्कि जनता के दर्द की राजनीति है।


रेल मंत्री ने जवाब में तकनीकी चुनौतियों का हवाला दिया। बोले—रेल संचालन जारी रहते हुए स्टेशन का पुनर्विकास करना बेहद कठिन होता है। कई देशों में ऐसे काम के लिए रेल ट्रैफिक बंद किया जाता है, पर भारत में ऐसा होना मुश्किल है।

मगर मंत्री का यह जवाब वह नहीं था, जिसका इंतज़ार आज़मगढ़ कर रहा था। न किसी समयसीमा का वादा, न कैफियात एक्सप्रेस की प्लेटफार्म समस्या का समाधान — बस व्यवस्थागत मजबूरी का वर्णन।


राजनीतिक रणनीतिकारों की मानें तो धर्मेंद्र यादव ने यह मुद्दा उठाकर आज़मगढ़ के जनहित को राष्ट्रीय स्तर पर ला खड़ा किया है। वहीं केंद्र सरकार पर यह दबाव बढ़ गया है कि अब केवल घोषणाओं से बात नहीं चलेगी — बल्कि जनता को राहत दिखनी चाहिए।

आजमगढ़ की जनता अब यह देख रही है कि संसद की गरम बहस ज़मीन पर ठंडा बदलाव लाएगी या फिर यह भी चुनावी नारों में बदलकर रह जाएगी।

पर एक बात तय है —
आज़मगढ़ रेलवे स्टेशन का मुद्दा अब राजनीति का केंद्र बन चुका है, और जनता की नज़रें इस जंग के नतीजे पर टिकी हैं।

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