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इंजीनियर सुनील कुमार यादव का संघर्ष और सफलता की कहानी

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युवा प्रेरणा: इंजीनियर सुनील कुमार यादव का संघर्ष और सफलता की कहानी

“हजारों साल नर्गिस अपनी बेबसी पर रोती है,
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।”

इस पंक्ति को जब अल्लामा इकबाल ने लिखा होगा, शायद उन्हें अंदाजा नहीं हुआ होगा कि एक दिन ये शब्द उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले एक शख्सियत, इंजीनियर सुनील कुमार यादव के जीवन पर सटीक बैठेंगे। संघर्ष, समर्पण, और सेवा की मिसाल बन चुके सुनील यादव आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए हैं।
इंजीनियर सुनील यादव का जन्म उत्तर प्रदेश के एक गरीब मजदूर परिवार में हुआ। उनके पिता एक फैक्ट्री में काम करते थे, जहां 2700 डिग्री के तापमान में जलती भट्ठियों के बीच पसीना बहाकर घर चलाते थे। उनकी माँ ने भी गरीबी और सामाजिक पिछड़ेपन को अपने साहस और संघर्ष से पार किया। मजदूर कॉलोनी में पले-बढ़े सुनील ने अपने बचपन में ही अपने परिवार की कठिनाइयों को देखा और महसूस किया।

सुनील की प्रारंभिक शिक्षा हिंडालको, रेणुकूट के एक स्थानीय स्कूल में हुई। अपनी कड़ी मेहनत और माता-पिता के बलिदान के बल पर उन्होंने प्रतिष्ठित हिंदुस्तान इंजीनियरिंग कॉलेज, आगरा से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। यह सफर आसान नहीं था। सीमित संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से साबित कर दिया कि सफलता का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन असंभव नहीं।
सुनील यादव अक्सर कहते हैं, “दक्ष हुआ नहीं जन्म से, अभ्यास तो करना होता है।” इस विचारधारा को आत्मसात करते हुए उन्होंने न केवल कॉरपोरेट जगत में ऊंचाईयां हासिल कीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी। बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों में उच्च पदों पर काम करने के बाद उन्होंने खुद की कंपनी स्थापित की और बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर काम किया।

उनकी नेतृत्व क्षमता, समय प्रबंधन और संसाधनों का कुशल उपयोग करने की क्षमता ने उन्हें एक सफल उद्यमी बना दिया। लेकिन यह सफलता उनके लिए पर्याप्त नहीं थी। उनकी नजर हमेशा से अपने समाज की समस्याओं और उनके समाधान पर थी।
सुनील यादव का मानना है कि समस्या के चार चरण होते हैं: समस्या को चिन्हित करना, उसे स्वीकार करना, बदलाव के लिए तैयार होना, और समाधान को लागू करना।
इन्हीं सिद्धांतों को अपनाते हुए उन्होंने अपने क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण बदलाव लाए। उनकी पहली बड़ी लड़ाई परशुरामपुर बाजार के निकट एक सरकारी अस्पताल में हुई। जब उन्हें गर्भवती महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और बच्चों को इलाज में हो रही समस्याओं की शिकायत मिली, तो वे खुद अस्पताल पहुंचे। वहां की दुर्व्यवस्था देखकर उन्होंने तत्काल कार्रवाई की। यह उनकी सामाजिक सक्रियता का शुरुआती दौर था।

इस घटना के बाद सुनील यादव ने खुद को गरीबों और वंचितों की आवाज के रूप में स्थापित कर लिया। उन्होंने गन्ना किसानों की बकाया राशि दिलाने, खराब सड़कों को ठीक करवाने और ट्रांसफार्मरों की समस्याओं को हल करवाने जैसे कार्य किए। उनके प्रयासों से क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर भी उत्पन्न हुए।
उनका यह कथन, “ना हमसफ़र, ना किसी हमनसीब से निकलेगा, हमारे पैर का कांटा हमसे ही निकलेगा,” उनके आत्मनिर्भर और संघर्षशील व्यक्तित्व को दर्शाता है।
सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए उनकी प्रतिबद्धता ने उन्हें राजनीति की ओर अग्रसर किया। आजमगढ़ में बाढ़ और डूब की समस्या को स्थायी रूप से हल करने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, और अन्य बड़े नेताओं का ध्यान इस ओर आकर्षित किया।

उनकी स्पष्ट दृष्टि और सुलझे विचारों ने उन्हें एक कुशल नेता के रूप में उभरने में मदद की। वे न केवल गरीबों की समस्याओं को समझते हैं, बल्कि उनके समाधान के लिए ठोस कदम भी उठाते हैं।
सुनील यादव का जीवन संघर्षों की एक कहानी है। उन्होंने अपने पिता को 2700 डिग्री की भट्ठी में काम करते देखा और अपनी माँ को हर दिन आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से जूझते हुए देखा। इन अनुभवों ने उन्हें मजबूत बनाया और जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
वे कहते हैं,
“कुछ खोया है, कुछ पा लेंगे,
कुछ माना है, मनवा लेंगे।
किस्मत के बंद लिफाफे में,
जो चाहा है, लिखवा लेंगे।”

यह आत्मविश्वास ही है, जिसने उन्हें न केवल खुद को साबित करने में मदद की, बल्कि अपने समाज के लिए भी एक मिसाल बनने का अवसर दिया।
सुनील यादव आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं। उनके प्रयासों ने उनके क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगाई है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद, मेहनत और समर्पण से कुछ भी संभव है।
आज सुनील यादव को क्षेत्र की जनता बड़े उत्साह और उम्मीद के साथ देखती है। उन्होंने अपने संघर्षों और समर्पण से न केवल अपने माता-पिता के सपनों को साकार किया, बल्कि अपने समाज की भी सेवा की। उनकी ईमानदारी और स्पष्ट विचारधारा ने उन्हें जनता के दिलों में एक विशेष स्थान दिया है।

उनका मानना है कि, “सीधी सच्ची बात कहूं, दिन को कैसे रात कहूं, सिक्के के दो पहलू हम, तुमको कैसे साथ कहूं।” यह कथन उनकी साफगोई और स्पष्टता को दर्शाता है।
सुनील यादव का सपना है कि वे अपने क्षेत्र को एक नई पहचान दिलाएं। उनकी कोशिश है कि क्षेत्र में स्थायी रोजगार के अवसर पैदा हों, बुनियादी सुविधाएं बेहतर हों, और हर व्यक्ति को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिले।
वे कहते हैं, “संघर्ष से ही सफलता मिलती है। हर चुनौती हमें कुछ नया सिखाती है।” उनकी यह सोच न केवल उन्हें, बल्कि उनके क्षेत्र और समाज को भी आगे बढ़ा रही है।

इंजीनियर सुनील कुमार यादव का जीवन संघर्ष और सफलता की एक अद्वितीय कहानी है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अगर मन में दृढ़ संकल्प और मेहनत करने की लगन हो, तो सफलता निश्चित है।
उनके प्रयास न केवल उनके क्षेत्र के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। वे सही मायने में एक सच्चे नेता और समाजसेवी हैं, जो बिना थके और बिना रुके अपने कार्यों में लगे हुए हैं। उनकी कहानी आज के युवाओं को यह सिखाती है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता, लेकिन मेहनत और लगन से सब कुछ संभव है।
सुनील यादव की यह यात्रा केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता की नहीं है, बल्कि उनके समाज और उनके क्षेत्र के विकास की भी कहानी है। उनकी संघर्षमय यात्रा हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है, जो अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहता है।

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