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महाकुंभ की शुरूआत से पहले प्रयागराज में सनातन धर्म का वैभव: अखाड़ों की पेशवाई की धूम

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प्रयागराज  :- महाकुंभ की शुरूआत अब कुछ ही दिनों में होने वाली है, और इसके साथ ही प्रयागराज की सड़कों पर सनातन धर्म का अद्वितीय वैभव बिखरने लगा है। हर तरफ बम-बम भोले की जयकारें गूंज रही हैं, और धार्मिक उत्साह की लहर हर किसी को अपने में समेटे हुए है। महाकुंभ के इस पवित्र आयोजन में शामिल होने के लिए अखाड़ों का मेला क्षेत्र में प्रवेश शुरू हो चुका है। इन अखाड़ों के बड़ा जुलूस, जिसे छावनी प्रवेश (पेशवाई) कहा जाता है, ने मेला क्षेत्र की सड़कों को संजीवनी दे दी है।

रविवार को प्रयागराज के नैनी क्षेत्र के मड़ौका स्थित श्री पंचदशनाम आवाह्न अखाड़ा ने अपना छावनी प्रवेश शुरू किया। यह यात्रा विशेष रूप से ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण मानी जा रही थी, क्योंकि यह महाकुंभ के आयोजन की शुरुआत का प्रतीक है। इस यात्रा की दूरी मेला क्षेत्र से करीब 13 से 14 किलोमीटर थी, लेकिन इस दूरी को तय करने में छह घंटे से अधिक का समय लग गया। यह समय जितना लंबा था, उतना ही भव्य और सांस्कृतिक था। रास्ते में लोगों का उत्साह, साधु-संतों की उपस्थिति और सनातन धर्म के प्रतीक भगवा रंग ने इसे एक अत्यंत धार्मिक अनुभव बना दिया।

पेशवाई की इस यात्रा में, जैसे ही अखाड़ा अपने आश्रम से मेला क्षेत्र की ओर बढ़ता है, उसके साथ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ भी जुटने लगती है। पूरी यात्रा में हर तरफ भगवा रंग का प्रभाव था, जो सनातनी परंपराओं का प्रतीक है। श्रद्धालुओं का यह उत्साह और श्रद्धा दर्शाता है कि इस आयोजन के प्रति उनका आस्था और विश्वास कितना गहरा है। सड़कों पर चलने वाले लोग अनायास ही हाथ जोड़कर उस पवित्र यात्रा का सम्मान कर रहे थे। इस दौरान सभी अपनी श्रद्धा का इज़हार कर रहे थे और महाकुंभ की इस यात्रा को एक ऐतिहासिक और धार्मिक अवसर मान रहे थे।

अखाड़ों की यात्रा का महत्व

महाकुंभ के समय अखाड़ों का पेशवाई का आयोजन अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है। यह एक प्रकार से अखाड़ों की धार्मिक शक्ति और प्रतिष्ठा का प्रतीक होता है। अखाड़ों के साधु-संतों का यह जलूस न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक होता है, बल्कि यह एक सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखता है। इस यात्रा में विभिन्न अखाड़े अपने अनुयायियों के साथ एक बड़े जुलूस के रूप में मेला क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, जो देखते ही देखते एक विशाल धार्मिक उत्सव में बदल जाता है।

प्रत्येक अखाड़ा अपने ऐतिहासिक परंपराओं और रीतियों के अनुसार इस यात्रा को आयोजित करता है। कुछ अखाड़े तो इस यात्रा में घोड़ों, बग्गियों और रथों का भी इस्तेमाल करते हैं, जबकि कुछ अखाड़े अपने अनुयायियों के साथ पैदल यात्रा करते हैं। इन यात्राओं का मुख्य उद्देश्य यही होता है कि यह पूरे समाज में सनातन धर्म की प्रतिष्ठा और अखाड़ों की महिमा का प्रसार करें। इस दौरान, भक्तजन और श्रद्धालु भी अखाड़ों के साथ इस पवित्र यात्रा का हिस्सा बनते हैं, जिससे उनकी आस्था और श्रद्धा की भावना भी मजबूत होती है।

महाकुंभ में अखाड़ों का ऐतिहासिक महत्व

महाकुंभ का आयोजन हर 12 वर्षों में होता है और यह हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा और पवित्र पर्व माना जाता है। इस आयोजन में विशेष रूप से संगम क्षेत्र में लाखों श्रद्धालु स्नान करने आते हैं, और यह एक अवसर होता है जब अखाड़े अपने अनुयायियों को एकत्र करते हैं। यह अवसर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ लाने का भी काम करता है।

प्रयागराज में हर अखाड़े का अपना एक ऐतिहासिक महत्व होता है, और यह सभी अखाड़े एक-दूसरे के बीच पारंपरिक रूप से प्रतिस्पर्धा करते हैं। इस समय, हर अखाड़ा अपनी धार्मिक कार्यवाहियों, परंपराओं और उत्सवों के माध्यम से सनातन धर्म का प्रचार करता है। महाकुंभ के आयोजन से पूर्व इन अखाड़ों के पेशवाई की यात्रा, जहां हर अखाड़ा अपनी शक्ति, आस्था और प्रतिष्ठा का प्रतीक प्रस्तुत करता है, यह समाज को यह सिखाता है कि धार्मिक विविधता के बावजूद, एकता और सहिष्णुता के साथ सब एक ही उद्देश्य के लिए एकत्र होते हैं।

श्रद्धालुओं का उत्साह और श्रद्धा

मेला क्षेत्र में प्रवेश करते समय अखाड़ों की पेशवाई को देखकर श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है। सड़कों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही थी, और लोग खुद को सनातनी परंपराओं में रंगे हुए महसूस कर रहे थे। अधिकांश लोग भगवा रंग के वस्त्र पहने हुए थे और बम-बम भोले के उद्घोष से वातावरण गूंज रहा था। यह दृश्य महाकुंभ की धार्मिक महत्ता को और भी प्रगाढ़ करता है। इस पवित्र यात्रा में शामिल होने वाले साधु-संतों का जुलूस एक ओर जहां समाज को धार्मिकता और आस्था का संदेश देता है, वहीं दूसरी ओर यह महाकुंभ के शुद्ध उद्देश्य की पुष्टि करता है।

महाकुंभ का आयोजन और सांस्कृतिक समागम

महाकुंभ का आयोजन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि यह एक सांस्कृतिक समागम भी होता है। इस आयोजन के माध्यम से न केवल धार्मिकता का प्रचार-प्रसार होता है, बल्कि यह हिंदू संस्कृति, परंपराओं और रीति-रिवाजों को भी प्रकट करता है। अखाड़ों के छावनी प्रवेश की यात्रा इस आयोजन का अहम हिस्सा है, क्योंकि यह पूरे समाज को एकसाथ जोड़ता है और सनातन धर्म के महत्व को समाज में स्थापित करता है।

महाकुंभ का यह आयोजन सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के विभिन्न देशों से आए श्रद्धालुओं के लिए एक अद्वितीय अवसर होता है। इस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति अपनी आस्था और विश्वास को साझा करता है और महाकुंभ के इस पवित्र आयोजन को भाग्य का हिस्सा मानता है। यह आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण होता है, बल्कि यह सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक बनता है।

निष्कर्ष

प्रयागराज में महाकुंभ की शुरूआत से पहले, अखाड़ों का मेला क्षेत्र में प्रवेश एक ऐतिहासिक और धार्मिक घटना है। इस यात्रा का आयोजन न केवल सनातन धर्म के लिए महत्वपूर्ण होता है, बल्कि यह पूरे समाज को एकसाथ जोड़ने का भी काम करता है। महाकुंभ का यह आयोजन सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण होता है, और इसके माध्यम से सनातन धर्म की महत्वता और अखाड़ों की आस्था का सम्मान किया जाता है।

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