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देश के सबसे सादगीभरे समाजवादी नेता आलमबदी आजमी नहीं रहे: 90 वर्ष की उम्र में निधन, आजमगढ़ ने खोया अपना जननेता….

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देश के सबसे सादगीभरे समाजवादी नेता आलमबदी आजमी नहीं रहे: 90 वर्ष की उम्र में निधन, आजमगढ़ ने खोया अपना जननेता

आजमगढ़। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सादगी, ईमानदारी और जनसेवा की मिसाल माने जाने वाले समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ विधायक आलमबदी आजमी का बुधवार देर रात 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपने आजमगढ़ स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। वह पिछले चार महीनों से गंभीर रूप से बीमार थे और लखनऊ के मेदांता अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। 13 जुलाई को अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद उन्हें घर लाया गया था, लेकिन स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। उनके निधन के साथ ही उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति ने एक ऐसे जनप्रतिनिधि को खो दिया, जिसकी पहचान सत्ता से अधिक सेवा, सादगी और ईमानदारी से थी। गुरुवार शाम 4 बजे उन्हें पूरे राजकीय सम्मान और हजारों लोगों की मौजूदगी में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।

 

आलमबदी आजमी वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सबसे वरिष्ठ और देश के सबसे उम्रदराज सक्रिय विधायकों में गिने जाते थे। लगभग नौ दशक का जीवन जीने के बावजूद उनकी सक्रियता युवाओं जैसी थी। यही कारण था कि करीब पांच महीने पहले जब वह अपनी स्कूटी से विधानसभा पहुंचे, तो उनकी तस्वीरें पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई थीं।

राजनीति में जहां बड़े-बड़े नेताओं का लंबा काफिला और आलीशान गाड़ियां पहचान बन चुकी हैं, वहीं आलमबदी आजमी हेलमेट पहनकर स्कूटी से विधानसभा पहुंचे। यह दृश्य उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा का परिचय था।

आलमबदी आजमी ने निजामाबाद विधानसभा सीट का पांच बार प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने 1996, 2002, 2007 सहित कई चुनावों में जनता का विश्वास जीता। लगातार तीन बार विधायक रहने के बाद भी उनके जीवन में सत्ता का कोई असर दिखाई नहीं दिया।वे न तो आलीशान बंगले में रहे, न लग्जरी गाड़ियों के शौकीन बने और न ही सुरक्षा के लंबे काफिले के साथ चले।

आज भी लोग बताते हैं कि वे अक्सर—बस से सफर कर लेते थे।कार्यकर्ताओं की बाइक पर बैठ जाते थे।राहगीरों से लिफ्ट मांग लेते थे।गांव-गांव पैदल घूमकर लोगों की समस्याएं सुनते थे।

एक व्यय्क्तित्व के साथ एक बात और जुडी थी ….आज के दौर में जहां नेता लाखों रुपये के कपड़े पहनते दिखाई देते हैं, वहीं आलमबदी आजमी की सादगी अलग पहचान रखती थी।उनका कुर्ता-पायजामा अंबेडकरनगर की टांडा मिल के करीब 30 रुपये प्रति मीटर वाले कपड़े से सिलता था।साधारण चप्पल, साधारण घड़ी और की-पैड वाला मोबाइल ही उनकी पहचान थे।उन्होंने कभी स्मार्टफोन का शौक नहीं रखा। राजनीति में दशकों तक रहने के बावजूद उन्होंने अपनी जरूरतों को सीमित रखा।

बता दें कि 16 मार्च 1936 को आजमगढ़ में जन्मे आलमबदी आजमी ने शुरुआती शिक्षा के बाद 1953 में गोरखपुर के इस्लामिया कॉलेज से इंटरमीडिएट किया।इसके बाद 1956 में उन्होंने इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया।तकनीकी शिक्षा प्राप्त होने के बावजूद उन्होंने नौकरी की बजाय समाज सेवा और राजनीति को अपना जीवन बना लिया। आलम बदी आजमी सिर्फ सादगी पसंद एक विधायक भर नहीं थे …बल्कि स्व.मुलायम सिंह यादव के सबसे भरोसेमंद नेताओं में से एक थे…समाजवादी आंदोलन से जुड़े आलमबदी आजमी को मुलायम सिंह यादव का बेहद करीबी माना जाता था।मुलायम सिंह यादव अक्सर उनकी ईमानदारी और साफगोई की चर्चा किया करते थे।आलमबदी उन गिने-चुने नेताओं में शामिल थे जो नेताजी के सामने बिना किसी डर के सच्ची बात कह देते थे।

 

आलमबदी आजमी किस हद तक इमानदार थे…ये आपको इस वाकये से पता चल जाएगा जो मैं आपको बताने जा रहा हूँ ….दरअसल उनकी ईमानदारी से जुड़ा सबसे चर्चित किस्सा 1996 के विधानसभा चुनाव का है….बताया जाता है कि चुनाव प्रचार के लिए मुलायम सिंह यादव ने उन्हें 5 लाख रुपये भेजे…लेकिन आलमबदी आजमी ने पैसे लेने से इनकार कर दिया।

आलम बदी आजमी  वह रकम लेकर खुद लखनऊ पहुंचे और मुलायम सिंह यादव जी से कहा—

नेताजी, मुझे इन पैसों की जरूरत नहीं है। मैं अपना चुनाव अपने लोगों के बीच रहकर लड़ लूंगा।” मेरी जनता ही काफी है मुझे जिताने के लिए ..मुझे किसी भी प्रचार ये पैसे की ज़रुरत नहीं …जानकार कहते हैं कि यह सुनकर मुलायम सिंह यादव भी भावुक हो गए थे…..आज भी समाजवादी पार्टी में यह किस्सा ईमानदार राजनीति की मिसाल के रूप में सुनाया जाता है।

आलमबदी आजमी से जुड़ा एक और चर्चित प्रसंग 2014 के लोकसभा चुनाव का है। उस समय मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। चुनाव प्रचार के दौरान अधिकांश नेता नेताजी को जीत के दावे कर रहे थे, लेकिन आलमबदी आजमी ने अलग रास्ता चुना।

उन्होंने साफ शब्दों में कहा—जमीन पर स्थिति उतनी आसान नहीं है जितनी आपको बताई जा रही है। लोगों तक और ज्यादा पहुंचना होगा।”कहा जाता है कि उनकी इस बेबाक सलाह के बाद चुनाव प्रचार की रणनीति बदली गई।

नेताजी ने जनसंपर्क बढ़ाया और चुनावी अभियान में तेजी लाई।समाजवादी पार्टी के कई पुराने नेताओं जिनमे वर्तमान जिलाध्यक्ष हवलदार यादव का मानना है कि यदि आलमबदी आजमी ने समय रहते वास्तविक स्थिति से अवगत नहीं कराया होता, तो चुनाव और अधिक कठिन हो सकता था।

वहीँ आलम बदी आजमी की एक और खासियत जो शायद ही किसी विधायक या सांसद में देखि गयी हो ….कहते हैं कि क्षेत्र में जब कोई सड़क बनती थी तो वो खुद पहुंच जाते थे….टेप लेकर सड़क की लम्बाई – चौड़ाई नापते थे …सड़क की परत को चेक करने के लिए खुद हाथों में कुदाल लेकर किनारे से उसकी खुदाई कर ये जांचते थे कि कहीं ठेकेदार ने कोई गड़बड़ी तो नहीं की ……

ग्रामीणों से पूछते—काम ठीक हुआ या नहीं?”यदि कहीं गड़बड़ी मिलती तो अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई के निर्देश देते।

राजनीति के अलावा उनका एक अलग ही मानवीय चेहरा था।गांवों के दौरे के दौरान जब बच्चे क्रिकेट खेलते दिखाई देते, तो वे खुद बैट उठा लेते थे।कई बार गेंदबाजी करते।कई बार बल्लेबाजी करते।बच्चों के साथ हंसते-खेलते नेता को देखकर लोग हैरान रह जाते थे।उनका मानना था कि जनता से दूरी बनाकर राजनीति नहीं की जा सकती।

 

आलमबदी आजमी के घर आने वाले लोगों के लिए कोई समय तय नहीं था।सुबह हो या शाम—जो भी अपनी समस्या लेकर पहुंचता, वे पूरी बात सुनते।यदि मामला प्रशासन से जुड़ा होता तो तुरंत फोन करते।जरूरत पड़ने पर खुद संबंधित अधिकारी के कार्यालय पहुंच जाते। इन सबके बीच 13 अप्रैल को उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई।उन्हें लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया।अप्रैल, मई, जून और जुलाई तक लगातार इलाज चलता रहा।13 जुलाई को डॉक्टरों ने उन्हें घर भेज दिया था।परिवार और समर्थकों को उम्मीद थी कि वह जल्द स्वस्थ होकर फिर लोगों के बीच लौटेंगे।लेकिन बुधवार देर रात उनका निधन हो गया।

इस दुखद घटना पर सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने शोक जताते हुए आलमबदी आजमी के निधन पर गहरा दुख व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने अपना एक समर्पित, ईमानदार और संघर्षशील साथी खो दिया है।आलमबदी आजमी का पूरा जीवन समाजवादी विचारधारा और जनता की सेवा के लिए समर्पित रहा।

आलमबदी आजमी के निधन के बाद उत्तर प्रदेश विधानसभा की चार सीटें रिक्त हो गई हैं।

इनमें—निजामाबाद (सपा) दुद्धी (सपा) घोसी (सपा) फरीदपुर (भाजपा)

शामिल हैं।चूंकि विधानसभा कार्यकाल समाप्त होने में अब एक वर्ष से भी कम समय बचा है, इसलिए इन सीटों पर उपचुनाव होने की संभावना नहीं है।

 

खैर , जहाँ आज के दौर में राजनीति अक्सर धनबल, बाहुबल और दिखावे से जोड़ी जाती है।लेकिन आलमबदी आजमी ने यह साबित किया कि जनता का विश्वास महंगी गाड़ियों से नहीं बल्कि ईमानदारी से जीता जाता है।उनकी सबसे बड़ी पूंजी जनता थी।उन्होंने न कभी संपत्ति जोड़ने की राजनीति की और न ही पद का व्यक्तिगत लाभ उठाया।

उनके निधन की खबर फैलते ही निजामाबाद, आजमगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में शोक की लहर दौड़ गई। उनके आवास पर हजारों लोगों का पहुंचना शुरू हो गया।ग्रामीण, किसान, व्यापारी, शिक्षक, छात्र और राजनीतिक दलों के नेता उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचे।कई बुजुर्गों की आंखें नम थीं।लोग एक ही बात कह रहे थे—ऐसे नेता अब बहुत कम पैदा होते हैं।”

उनके निधन की खबर सुनकर आजमगढ़ के सांसद धर्मेन्द्र यादव ने भी गहरा दुःख व्यक्त करते हुए कहाकि समाजवादी आंदोलन के वरिष्ठ स्तंभ, आज़मगढ़ की निज़ामाबाद विधानसभा से पाँच बार विधायक रहे ….. आलमबदी आज़मी साहब का निधन अत्यंत दुःखद और अपूरणीय क्षति है।

धर्मेन्द्र यादव कहते हैं कि उन्होंने राजनीति को सत्ता का नहीं, बल्कि समाज सेवा का माध्यम बनाया। सादगी, ईमानदारी, संघर्ष और जनसमर्पण उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान रही। जीवन भर वे समाजवादी मूल्यों के प्रति अडिग रहे और आम लोगों के सुख-दुःख में हमेशा उनके साथ खड़े रहे। उनकी विनम्रता, सहृदयता और जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता ने उन्हें केवल आज़मगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश और देश में सम्मान दिलाया…उनके जाने से समाजवादी आंदोलन ने अपना एक अनुभवी, कर्मठ और जनप्रिय अभिभावक खो दिया है। उनका जीवन, उनके आदर्श और संघर्ष की विरासत आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। यह रिक्तता कभी भर नहीं सकेगी। ये उदगार धर्मेन्द्र यादव के रहे ….

खैर आपको बता दें कि आलमबदी आजमी का राजनीतिक जीवन लगभग तीन दशक से अधिक लंबा रहा, लेकिन उन्होंने कभी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।उन्होंने सादगी को अपनी ताकत बनाया।ईमानदारी को अपनी पहचान बनाया।और जनता की सेवा को अपना धर्म माना।उनकी विरासत केवल पांच बार विधायक बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह उस राजनीतिक संस्कृति की याद दिलाती है जिसमें नेता जनता के बीच रहता था, उनकी भाषा बोलता था और उनकी समस्याओं को अपनी समस्या मानता था।

आज जब उत्तर प्रदेश की राजनीति उनके बिना आगे बढ़ेगी, तब भी आलमबदी आजमी का नाम सादगी, साफगोई और जनसेवा की मिसाल के रूप में लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा। उनका निधन केवल समाजवादी पार्टी की क्षति नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में मूल्यों की राजनीति को मानने वाले हर व्यक्ति की अपूरणीय क्षति है। अलविदा आलम बदी साहब …

रिपोर्ट : वसीम अकरम

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