उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। चुनाव से पहले दल-बदल और नए राजनीतिक समीकरणों का दौर शुरू हो चुका है। इसी कड़ी में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पूर्व कद्दावर नेता और मायावती के करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी (सपा) का दामन थाम लिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उन्हें औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता दिलाई। उनके साथ तीन बार के विधायक अनीस अहमद खान समेत कई पूर्व विधायक भी सपा में शामिल हो गए, जिससे प्रदेश की सियासत में नए समीकरण बनने के संकेत मिल रहे हैं।
इसके अलावा अपना दल (एस) के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार पाल का सपा में शामिल होना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों के अनुसार नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में आना आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी के लिए रणनीतिक बढ़त साबित हो सकता है और इससे बहुजन वोट बैंक पर सपा की पकड़ मजबूत होने की संभावना है।
सपा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने दावा किया कि उनके साथ 15,718 लोगों ने बसपा से इस्तीफा देकर समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली है। उन्होंने कहा कि वह समाजवादी विचारधारा को मजबूत करने और प्रदेश में बदलाव लाने के उद्देश्य से सपा में शामिल हुए हैं।
इस मौके पर सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि बहुजन समाज का रिश्ता समाजवादी पार्टी से लगातार मजबूत हो रहा है और पार्टी का पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) परिवार और सशक्त बन रहा है। उन्होंने कहा कि इस बार होली से पहले ही पीडीए परिवार का होली मिलन हो रहा है। अखिलेश यादव ने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर और डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने समाज को एकजुट करने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं मिला।
अखिलेश यादव ने बिना नाम लिए प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग दूसरों से प्रमाण पत्र मांग रहे हैं, पहले उन्हें अपना प्रमाण पत्र देना चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग मुख्यमंत्री के अर्थ को लेकर भी अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं और प्रदेश में राजनीतिक बयानबाजी का स्तर गिरता जा रहा है।
प्रयागराज प्रकरण का जिक्र करते हुए सपा प्रमुख ने कहा कि कुछ लोग पूजनीय शंकराचार्य का भी अपमान कर रहे हैं और जो पीड़ित हैं, वे पीडीए समाज के लोग हैं, इसलिए समाजवादी पार्टी उनके साथ खड़ी है।
प्रदेश में लगातार हो रहे दल-बदल और सियासी बयानबाजी से स्पष्ट है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी रणनीति तेज कर दी है। आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में और बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
