साढे़ सोलह लाख रूपये देने के बावजूद बैनामा के लिए भटक रही महिला

 पीड़ित महिला ने सत्ता पक्ष की महिलाओं को ठहराया दोषी
पत्रकारों से बातचीत करतीं पीड़िता रेशमा देवी
फतेहपुर। शहर के सुन्दरनगर कालोनी में एक मकान को खरीदने के लिए साढ़े सोलह लाख रूपये एग्रीमेन्ट कराते समय देने के बावजूद विक्रेता द्वारा अब बैनामा किये जाने में अड़ंगे डाले जाने से रूपये देने वाला परिवार दर-दर की ठोंकरे खाने को मजबूर है। बैनामा कराने के आदेश के लिए सिविल जज सी0डि0 के न्यायालय में भी वाद विचाराधीन है। जिसकी सुनवाई के लिए ग्यारह अगस्त की तिथि निर्धारित है। पीड़ित महिला ने पत्रकारों से कहा कि सत्तारूढ़ दल का संरक्षण मिलने के चलते विक्रेता नाना प्रकार से परेशान कर रहा है। इतना ही नहीं छह दिन पहले विक्रेता ने उसके मकान में ताला डाल दिया था। गुहार लगाने पर जिलाधिकारी के हस्ताक्षेप पर ताला खुल सका था।
पत्रकारों से बातचीत करते हुए मूल रूप से असोथर कस्बे की रहने वाली सुरेश कुमार पाण्डेय की पत्नी रेशमा देवी ने बताया कि सुन्दरनगर कालोनी स्थित सीमा तिवारी के सचिन तिवारी मकान के मालिक हैं। साढ़े अट्ठारह लाख रूपये में मकान को खरीदना तय हुआ था। जिसका रजिस्टर्ड एग्रीमेन्ट 17 अक्टूबर को करा लिया था। तय रकम में 15 लाख रूपये अग्रिम धनराशि दे दी गयी थी। इस एग्रीमेन्ट में सचिन तिवारी ने हस्ताक्षर किये थे और उसकी मां सीमा तिवारी गवाह बनी थी। शेष साढ़े तीन लाख रूपये बैनामा के समय देने की लिखित बात कही थी। उन्होने बताया कि भुगतान किया गया साढ़े दस लाख रूपये एकाउंट से एकाउंट में स्थानान्तरित किये गये हैं। एकरारनामे के बाद भी सचिन ने रूपयों की मांग की थी। जिस पर डेढ़ लाख रूपये चेक द्वारा छह फरवरी को दे दिया गया था। उन्होने बताया कि साढ़े सोलह लाख रूपये देने के बाद मकान के तीन कमरों में कब्जा मिल गया था। जिसकी मरम्मत कराकर वह अपने बच्चों संग रहने लगी थी। बैनामा कराने के लिए लगातार सचिन व उसकी मां से कहती रही लेकिन बैनामा करने से न तो तैयार हुए और न ही दी गयी धनराशि को लौटा रही है। उन्होने बताया कि इस पूरे मामले में सीमा तिवारी व सचिन को सत्तारूढ़ दल की महिला मोर्चा के अलावा अन्य प्रभावशाली लोगों का संरक्षण हासिल है। उन्होने रोते हुए बताया कि 29 जुलाई को सुबह पूजा के लिए मंदिर चली गयी थीं। इसी बीच मकान मालिक ने कमरों में ताला डाल दिया था। वह दिन भर ताला खुलवाने के लिए पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के चक्कर लगाती रहीं। लेकिन उसे न्याय नहीं मिला। इस पर जिलाधिकारी से मिलकर न्याय मांगा। तब जाकर डीएम के निर्देश पर रात डेढ़ बजे कमरों का ताला खुल सका था।

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