राहुल सांकृत्यायन: जिन्हें सीमाएँ नहीं रोक सकीं – लेखक: जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ 

समीक्षा
राहुल सांकृत्यायन: जिन्हें सीमाएँ नहीं रोक सकीं
-हरिशंकर राढ़ी
यायावरी साहित्य के प्रतिमान, बहुभाषाविज्ञ, सामाजिक चेतना के वाहक और लोक से जुड़े साहित्यकार महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर न जाने कितनी पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और विभिन्न पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हुए हैं। न जाने कितने विशेषांक निकले होंगे और न जाने कितनी गोष्ठियाँ हुई होंगी। उनकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति एवं विद्वता की कितनी चर्चाएँ हुईं और होती रहेंगी। विभिन्न विधाओं में पर लगभग डेढ़ सौ पुस्तकें लिखने वाले राहुल सांकृत्यायन पर लिखने वाला हर लेखक गौरवान्वित महसूस करता है। फिर जिस आजमगढ़ जनपद में राहुल सांकृत्यायन का जन्म हुआ, वहाँ का कोई लेखक उनपर गर्व की विशेष अनुभूति एवं अपनत्व से लिखेगा। ऐसी ही अनुभूति से आजमगढ़ के वरिष्ठ एवं प्रसिद्ध लेखक जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ ने राहुल सांकृत्यायन की जीवनी ‘ राहुल सांकृत्यायन जिन्हें सीमाएँ नहीं रोक सकीं’ लिखकर एक महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। यह पुस्तक इसलिए सबसे अलग एवं उपयोगी कही जा सकती है कि इसमें राहुल सांकृत्यायन के संपूर्ण जीवन के लगभग हर वर्ष का हिसाब-किताब रखा गया है एवं उनके कृतित्व को एक जिल्द में ही समाहित करने का प्रयास किया गया है।
किसी महान व्यक्ति की अच्छी जीवनी लिखने एवं पढ़ने वाले के समक्ष एक ऊहापोह की स्थिति यह रहती है कि अच्छाई के लिए महान व्यक्तित्व को श्रेष्ठ समझे या जीवनी लेखक को। इसमें संदेह नहीं कि श्रेय तो महान व्यक्तित्व को ही जाना चाहिए क्योंकि वही कारण एवं आलंब है, किंतु उसको कुशलतापूर्वक प्रस्तुत कर पाने वाले लेखक का महत्त्व भी कम करके नहीं आँका जाना चाहिए। यदि जीवनीकार में दम नहीं हो तो वह महान व्यक्तित्व का कद घटा देगा। अच्छी जीवनियों में मुझे विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखित आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवनी ‘व्योमकेश दरवेश’ याद आती है। इसमें लेखक ने इस युगपुरुष को एक नई ऊँचाई प्रदान की है। इस संक्षिप्त जीवनी में ‘कुन्द’ जी ने राहुल सांकृत्यायन के बहुआयामी जीवन को बड़ी कुशलता से समाहित किया है। यदि किसी को राहुल सांकृत्यायन के जीवन के तमाम आयामों को एक जगह प्राप्त करना है तो ‘कुन्द’ जी द्वारा लिखित इस पुस्तक को पढ़ना चाहिए।
164 पृष्ठों की इस जीवनी को लेखक ने कुल 10 खंडों में बाँटा है। अपनी बात में लेख इस पुस्तक को लिखने के क्रम में आई कठिनाइयों तथा उनसे निपटने के लिए किए गए श्रम को रेखांकित किया है। लेखक का कहना है राहुल सांकृत्यायन पर अनेक पुस्तकें लिखी गईं किन्तु एक जगह पर समस्त उपयोग जानकारी नहीं मिल पाती। इस पुस्तक में उन्होंने इस कमी को दूर करने का प्रयास किया है। यह सच है कि राहुल सांकृत्यायन जैसे विराट व्यक्तित्व के विषय में संक्षेप में लिख पाना दुष्कर है।
प्रथम प्रकरण ‘जीवन धारा’ तथा दूसरा प्रकरण ‘रचना धारा’ इस अंक के प्रमुख एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण भाग हैं। लेखक इस बात का जिक्र बहुत गर्व से करता है कि राहुल सांकृत्यायन का जन्म साहित्यिक क्षेत्र में अति विशिष्ट स्थान रखने वाले जनपद आजमगढ़ के एक ग्राम्यांचल पन्दहा में हुआ था। आजमगढ़ मेें ‘हरिऔध’ और श्यामनारायण पांडेय जैसे हिंदी साहित्य की विभूतियों ने जन्म लिया था। लेखक भी आजमगढ़ का है, इसलिए उसका गर्वित होना स्वाभाविक है। इस प्रकरण में लेखक ने राहुल सांकृत्यायन के जीवन के हर वर्ष का सिलसिलेवार वर्णन ही नहीं किया है, उनके विचारों एवं संघर्षों का भी जीवंत वर्णन किया है। राहुल सांकृत्यायन बहुत सी देशी-विदेशी भाषाओं के पूर्ण अधिकारी होने के बावजूद हिंदी के प्रति परम अनुरागी थे। उन्होंने उर्दू को भारतीय संघ की भाषा बनाने का जोरदार विरोध करते हुए इस बात का पुरजोर समर्थन किया था कि हिंदी को ही भारत की भाषा होनी चाहिए।
‘रचना धारा’ प्रकरण  में ‘कुन्द’ जी ने राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित सभी पुस्तकों की भाषा एवं विषयवस्तु की संक्षिप्त जानकारी दी है। उनके उपन्यासों एवं अन्य साहित्यिक कृतियों की जानकारी के साथ कथानक को भी बताने का प्रयास किया है। उल्लेखनीय है कि लेखक ने राहुल सांकृत्यायन की अनेक पुस्तकों का अध्ययन करने के बाद उनका सारांश लिखा है। यह भी रेखांकित किए जाने योग्य है कि ‘कुन्द’ जी राहुल सांकृत्यायन के तमाम भावुक एवं मानवीय क्षणों को दिखाने की पूरी कोशिश की है। सामान्यतः एक वर्ग ऐसा है जो राहुल सांकृत्यायन के गृहत्याग को जीवन से पलायन के रूप में लेता है एवं पत्नी त्याग के लिए उनकी निंदा भी करता है। वह ऐसा कर सकता है किंतु राहुल सांकृत्यायन ‘कनैला की कथा’ को बहुत आत्मीय ढंग से लिखते हैं और उसका समर्पण अपनी परित्यक्ता को इस प्रकार करते हैं – ” समर्पण- उसी प्रथम परिणीता को जिसका सारा जीवन मेरी महत्त्वाकांक्षाओं का शिकार हुआ।“
तीसरे प्रकरण ‘ राहुल सांकृत्यायन का विचार – स्वातंत्र्य’ में लेखक ने उनके विचारों एवं भावनाओं को वर्णित किया है। यह प्रकरण राहुल सांकृत्यायन के वैराट्य को दिखाता है। विदेशी विद्वानों की दृष्टि में राहुल सांकृत्यायन का महत्त्व कितना था, यह भी लेखक ने एक जगह देने का प्रयास किया है।
जीवनवृत्त के साथ लेखन ने परिशिष्ट के रूप में राहुल सांकृत्यायन के समग्र रचना संसार की विस्तृत सूची दी है जिसमें कृति का नाम, लेखन एवं प्रकाशन वर्ष, प्रकाशक तथा किन भाषाओं में अनुवाद हुआ है, यह भी दिया है। इससे अधिक सामग्री की कल्पना सीमित पृष्ठों की एक पुस्तक में नहीं की जा सकती। अंततः संदर्भ ग्रंथों एवं पत्रिकाओं की सूची देकर लेखन ने अपने समस्त प्रस्तुतीकरण को अधिकृत एवं संदेह से परे कर दिया है।
वस्तुतः यह जीवनी राहुल सांकृत्यायन समग्र को एक स्थान पर समेेटने का प्रशंसनीय प्रयास है। भाषा-शैली की बात की जाए तो यह सर्वथा अनुकूल एवं सहज है। जिन्हें कम समय एवं श्रम में राहुल सांकृत्यायन पर स्वस्थ एवं स्पष्ट जानकारी चाहिए, उनके लिए यह पुस्तक संग्रहणीय है। इसके लिए जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’ साधुवाद के पात्र हैं।
पुस्तक: राहुल सांकृत्यायन: जिन्हें सीमाएँ नहीं रोक सकीं (जीवनी)
लेखक: जगदीश प्रसाद बरनवाल ‘कुन्द’
प्रकाशक: लोकभारती प्रकाशन,
 दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग
 प्रयागराज – 211001
        पृष्ठ: 164  मूल्य: 300/
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